श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.22.9 
प्रियव्रतोत्तानपदो: स्वसेयं दुहिता मम ।
अन्विच्छति पतिं युक्तं वय: शीलगुणादिभि: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
मेरी बेटी प्रियव्रत और उत्तानपाद की बहन है। वह आयु, गुण और अच्छे स्वभाव में उसके अनुरूप पति की तलाश में है।
 
My daughter is the sister of Priyavrata and Uttanapada. She is looking for a husband suitable for her in terms of age, character, qualities etc.
तात्पर्य
स्वायंभुव मनु की बड़ी हुई कन्या देवहूति सदगुण सम्पन्न और महाविदुषी थीं, अतः वे अपनी आयु, गुण, धर्म के अनुकूल वर की खोज में थीं। देवहूति को मनु द्वारा प्रियव्रत और उत्तनपाद नामक दो श्रेष्ठ राजाओं की बहन कहकर ऋषि को विश्‍वास दिलाया गया कि कन्या श्रेष्ठ कुल की है। कन्या उनकी पुत्री थी और साथ ही क्षत्रियों की बहन भी थी, नीच कुल की नहीं थी। इस प्रकार मनु ने अपनी कन्या को कर्दम ऋषि के लिए उचित बताकर उन्हें अर्पित किया। इस कथन से स्पष्ट है कि कन्या यद्यपि गुणों और आयु में पूर्ण युक्त थी, फिर भी वह स्वयं पति ढूंढने में स्वतंत्र नहीं हुईं। उन्होंने अपने गुण, धर्म, आयु के अनुकूल पति की इच्छा प्रकट की, और पिता स्वयं पुत्री-स्नेह के कारण योग्य पति खोजने का भार अपने ऊपर लेते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)