तमायान्तमभिप्रेत्य ब्रह्मावर्तात्प्रजा: पतिम् ।
गीतसंस्तुतिवादित्रै: प्रत्युदीयु: प्रहर्षिता: ॥ २८ ॥
अनुवाद
उसे (राजा को) आता हुआ देखकर, उसकी प्रजा अत्यधिक खुश होकर ब्रह्मावर्त से बाहर निकल आयी और वापस आते हुए अपने राजा का गीतों, स्तुतियों और संगीत के साथ अभिनंदन किया।
Knowing about the arrival of the king, his subjects came out of Brahmavarta with immense joy and while returning, honored their king with songs, praises and instrumental music.
तात्पर्य
राजा के किसी दौरे से लौटने पर, उस राज्य की राजधानी के नागरिकों का रिवाज होता है कि वे अपने राजा का स्वागत करते हैं। एक ऐसा ही वर्णन मिलता है जब कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद कृष्ण द्वारका लौटे थे। उस समय शहर के द्वार पर सभी वर्गों के नागरिकों ने उनका स्वागत किया था। पहले, राजधानी शहरों को दीवारों से घेरा जाता था, और नियमित प्रवेश के लिए अलग-अलग द्वार होते थे। आज भी दिल्ली में पुराने द्वार हैं, और कुछ अन्य पुराने शहरों में ऐसे द्वार हैं जहाँ नागरिक राजा का स्वागत करने के लिए इकट्ठा होते थे। यहाँ भी ब्रह्मावर्त के सम्राट, स्वाम्भुव के राज्य की राजधानी, बृह्मती के नागरिक सम्राट का स्वागत करने के लिए भली प्रकार से सजे हुए, सजावट और संगीत वाद्ययंत्रों के साथ आए थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥