प्रत्तां दुहितरं सम्राट् सदृक्षाय गतव्यथ: ।
उपगुह्य च बाहुभ्यामौत्कण्ठ्योन्मथिताशय: ॥ २४ ॥
अनुवाद
इस प्रकार अपनी पुत्री को उचित वर के हवाले करके स्वायंभुव मनु ने अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पाई, परंतु वियोग से उनका मन व्यथित हो उठा और उन्होंने अपनी प्रिय पुत्री को दोनों बाहों में भर लिया।
Thus, having freed himself from his responsibility by giving his daughter to a suitable groom, Svayambhuva Manu's mind became agitated due to separation and he took his beloved daughter in his arms.
तात्पर्य
जब तक कोई पिता अपनी बड़ी हुई बेटी किसी सभ्य लड़के के हवाले नहीं कर देते हैं, तब तक वे हमेशा चिंता में रहते हैं। माता-पिता का बच्चों के प्रति उत्तरदायित्व तब तक बना रहता है, जब तक वो उन्हें उपयुक्त व्यक्तियों से विवाह करके न दे दें, जब पिता ये कर्तव्य पूरा कर लेते हैं, तो वे अपने कर्त्तव्य से मुक्त हो जाते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥