यतोऽभवद्विश्वमिदं विचित्रं
संस्थास्यते यत्र च वावतिष्ठते ।
प्रजापतीनां पतिरेष मह्यं
परं प्रमाणं भगवाननन्त: ॥ २० ॥
अनुवाद
मेरे लिए सर्वोच्च सत्ता असीम श्रीभगवान हैं, जिनसे विचित्र सृष्टि की उत्पत्ति हुई है और जिन पर जीवन का अस्तित्व और अंत निर्भर है। वे सभी प्रजापतियों के मूल हैं जो इस दुनिया में प्राणियों को जन्म देते हैं।
For me, the supreme authority is the infinite Shri Bhagwan from whom this wonderful universe originates and on whom its sustenance and dissolution depend. He is the origin of all those Prajapatis, who are the great men who create living beings in this world.
तात्पर्य
कर्दम मुनि को उनके पिता प्रजापति ने संतान उत्पन्न करने का आदेश दिया। सृष्टि के आरम्भ में प्रजापतियों को उस विशाल जगत के ग्रहों में बसने के लिए एक विशाल आबादी पैदा करनी थी। परन्तु कर्दम मुनि ने कहा कि हालाँकि उनके पिता प्रजापति थे, जो चाहते थे कि वह बच्चे पैदा करें, परन्तु वास्तव में उनकी उत्पत्ति परमात्मा विष्णु से हुई थी, क्योंकि विष्णु ही हर चीज़ की उत्पत्ति हैं; वे इस जगत के वास्तविक निर्माता हैं, वे ही वास्तव में इसका पालन करते हैं, और जब सब कुछ नष्ट हो जाता है, तब केवल उसी में निवास बनाए रखता है। यही श्रीमद् भागवतम् का निष्कर्ष है। सृष्टि, पालन और संहार के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर (शिव) तीन देवता हैं, परन्तु ब्रह्मा और महेश्वर, विष्णु के गुणात्मक विस्तार हैं। विष्णु केन्द्रीय व्यक्ति हैं। इसलिए वे पालन का कार्य सम्भालते हैं। उनके सिवा कोई दूसरा पूरी सृष्टि का पालन नहीं कर सकता। असंख्य इकाइयाँ हैं, और उनकी माँगें भी असंख्य हैं; विष्णु के सिवा कोई भी असंख्य जीव-जंतुओं की असंख्य माँगों को पूरा नहीं कर सकता। ब्रह्मा को सृजन करने का आदेश दिया गया है और शिव को संहार करने का। मध्य कार्य, पालन, विष्णु का है। कर्दम मुनि को अपनी आध्यात्मिक उन्नति में अपनी शक्ति से यह अच्छी तरह मालूम था कि विष्णु, परमात्मा, उनकी पूजनीय देवता थे। विष्णु की जो भी इच्छा थी, वह उनका कर्तव्य था, और कुछ नहीं। वह अनगिनत बच्चे पैदा करने के लिए तैयार नहीं थे। वह केवल एक बच्चा पैदा करेंगे, जो विष्णु के उद्देश्य में मदद करेगा। जैसा कि भगवद गीता में कहा गया है, जब भी धार्मिक सिद्धांतों के निर्वहन में कोई असंगति होती है, तब प्रभु पृथ्वी पर धार्मिक सिद्धांतों की रक्षा और दुष्टों को नष्ट करने के लिए अवतरित होते हैं। विवाह करना और बच्चे पैदा करना किसी परिवार के प्रति व्यक्ति के ऋण को चुकाने के लिए माना जाता है जहाँ व्यक्ति का जन्म होता है। कई ऋण होते हैं जो जन्म लेने के ठीक बाद एक बच्चे पर लागू होते हैं। उस परिवार के प्रति ऋण होता है जहाँ उसका जन्म होता है, देवताओं के प्रति ऋण होता है, पितरों के प्रति ऋण होता है, ऋषियों के प्रति ऋण होता है, इत्यादि। परन्तु अगर कोई परमात्मा, परमेश्वर की ही सेवा में लग जाता है, जहाँ वास्तव में पूजा की जाती है, तब बिना अन्य ऋणों को चुकाने की कोशिश किए भी, वह सभी दायित्वों से मुक्त हो जाता है। कर्दम मुनि ने परमहंस ज्ञान में प्रभु का सेवक बनकर अपना जीवन समर्पित करने को प्राथमिकता दी, और केवल उसके उद्देश्य के लिए एक बच्चा पैदा करने को, न कि जगत में रिक्त स्थान भरने के लिए असंख्य बच्चे पैदा करने को।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥