अतो भजिष्ये समयेन साध्वीं
यावत्तेजो बिभृयादात्मनो मे ।
अतो धर्मान् पारमहंस्यमुख्यान्
शुक्लप्रोक्तान् बहु मन्येऽविहिंस्रान् ॥ १९ ॥
अनुवाद
इसलिए मैं इस पवित्र कन्या को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करूँगा, परन्तु इस शर्त के साथ कि जब वह मेरे शरीर से वीर्य प्राप्त करेगी तब मैं पूर्ण सिद्ध पुरुषों के समान भक्ति-योग को स्वीकार करूँगा। यह प्रक्रिया भगवान विष्णु द्वारा बताई गई है और यह ईर्ष्या रहित है।
Therefore, I will accept this virgin as my wife, but on the condition that when she has taken my semen, I will accept Bhakti-Yoga like the most perfect men. This method has been told by Lord Vishnu and it is without malice.
तात्पर्य
कार्दम मुनि ने सम्राट स्वायम्भुव के समक्ष एक बहुत ही खूबसूरत पत्नी की इच्छा व्यक्त की और उन्होंने विवाह के लिए सम्राट की पुत्री को स्वीकार कर लिया। कार्दम मुनि अपने आश्रम में एक ब्रह्मचारी के रूप में सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे और यद्यपि उनकी विवाह करने की इच्छा थी, किन्तु वे अपने जीवन के सम्पूर्ण काल के लिए गृहस्थ नहीं बने रहना चाहते थे क्योंकि वे मानव जीवन के वैदिक सिद्धांतों से अवगत थे। वैदिक सिद्धांतों के अनुसार जीवन का प्रथम भाग चरित्र और आध्यात्मिक गुणों के विकास हेतु ब्रह्मचर्य में व्यतीत किया जाना चाहिए। जीवन के अगले भाग में व्यक्ति पत्नी को स्वीकार कर सकता है और संतान उत्पन्न कर सकता है, किन्तु उसे कुत्तों और बिल्लियों की तरह संतान उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। कार्दम मुनि की इच्छा ऐसी संतान उत्पन्न करने की थी जो भगवान की एक किरण होगी। व्यक्ति को ऐसी संतान उत्पन्न करनी चाहिए जो विष्णु के कर्तव्यों का पालन कर सके, अन्यथा संतान उत्पन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अच्छे पिताओं से दो तरह की संतान होती है: एक को कृष्णभावनामृत में शिक्षित किया जाता है जिससे वह इसी जीवन में माया के चंगुल से मुक्त हो सके और दूसरी भगवान की एक किरण होती है और वह संसार को जीवन के परम लक्ष्य का उपदेश देती है। जैसा कि आने वाले अध्यायों में वर्णन किया जाएगा, कार्दम मुनि को ऐसी संतान प्राप्त हुई थी- कपिल, भगवान के अवतार जिन्होंने सांख्य के दर्शन को प्रतिपादित किया था। महान गृहस्थ भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे अपने प्रतिनिधि को भेजें जिससे मानव समाज में कोई शुभ आंदोलन हो सके। यह संतान उत्पन्न करने का एक कारण है। एक अन्य कारण यह है कि एक अत्यधिक ज्ञानवान माता-पिता संतान को कृष्णभावनामृत में प्रशिक्षित कर सकते हैं जिससे संतान को इस दयनीय संसार में फिर से वापस नहीं आना पड़ेगा। माता-पिता को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनसे जन्मी संतान फिर से किसी माता की कोख में न आए। जब तक कोई व्यक्ति संतान को उस जीवन में ही मुक्ति के लिए प्रशिक्षित न कर सके, तब तक विवाह या संतान उत्पन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि मानव समाज सामाजिक व्यवस्था के विघटन के लिए कुत्तों और बिल्लियों जैसी संतान उत्पन्न करता है, तो संसार नारकीय बन जाता है, जैसा कि यह कलियुग में बन गया है। इस युग में न तो माता-पिता और न ही उनकी संतान को प्रशिक्षित किया जाता है; दोनों ही पशुवत हैं और केवल खाना, सोना, संभोग करना, रक्षा करना और अपनी इन्द्रियों को संतुष्ट करना ही जानते हैं। सामाजिक जीवन में यह अव्यवस्था मानव समाज में शांति नहीं ला सकती है। कार्दम मुनि पहले से ही बता देते हैं कि वह जीवन पर्यंत लड़की देवहूति के साथ नहीं रहेंगे। वह केवल तब तक उनके साथ रहेंगे जब तक उनकी कोई संतान न हो जाए। दूसरे शब्दों में, संभोग जीवन का उपयोग केवल एक अच्छी संतान उत्पन्न करने के लिए किया जाना चाहिए, किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं। मानव जीवन विशेष रूप से भगवान की सेवा के लिए सम्पूर्ण समर्पण के लिए है। यही भगवान चैतन्य का दर्शन है। एक अच्छी संतान उत्पन्न करने की अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने के बाद व्यक्ति को संन्यास ले लेना चाहिए और पूर्णत्व की परमहंस अवस्था में प्रवृत्त होना चाहिए। परमहंस का अर्थ जीवन की सबसे उच्च पूर्णावस्था है। संन्यास जीवन में चार अवस्थाएँ हैं और परमहंस उच्चतम श्रेणी की है। श्रीमद्भागवतम् को परमहंस संहिता कहा जाता है, जो मनुष्यों की उच्चतम श्रेणी के लिए ग्रंथ है। परमहंस ईर्ष्या से मुक्त होता है। अन्य अवस्थाओं में, जीवन की गृहस्थ अवस्था में भी, प्रतियोगिता और ईर्ष्या होती है, परन्तु चूँकि परमहंस अवस्था में मानव की क्रियाएँ पूर्णतः कृष्णभावनामृत या भक्ति सेवा में लीन होती हैं, इसलिए ईर्ष्या की कोई गुंजाइश नहीं होती है। कार्दम मुनि की तरह ही लगभग सौ वर्ष पूर्व ठाकुर भक्तिविनोद भी एक ऐसे बच्चे की इच्छा रखते थे जो भगवान चैतन्य के दर्शन और शिक्षाओं का पूरी तरह से प्रचार कर सके। भगवान से अपने प्रार्थना द्वारा उन्होंने भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज को अपनी संतान के रूप में पाया, जो वर्तमान क्षण में अपने प्रामाणिक शिष्यों के माध्यम से पूरी दुनिया में भगवान चैतन्य के दर्शन का प्रचार कर रहे हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥