ऋषिरुवाच
बाढमुद्वोढुकामोऽहमप्रत्ता च तवात्मजा ।
आवयोरनुरूपोऽसावाद्यो वैवाहिको विधि: ॥ १५ ॥
अनुवाद
महात्मा ने उत्तर दिया- निस्संदेह मेरा विवाह करने का अभिप्राय है और आपकी बेटी ने न किसी से विवाह किया है और न ही किसी अन्य व्यक्ति से वचनबद्धता की है। अतः वैदिक विधि से हमारा विवाह हो सकता है।
The great sage replied, "Of course I am willing to get married and your daughter has neither married anyone nor has she given a promise to anyone else. Therefore, according to the Vedic tradition, we both can get married."
तात्पर्य
देवहूति की कन्या को स्वीकार करने के पहले कार्दम मुनि के सामने बहुत-से विचार थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सर्वप्रथम देवहूति ने अपना मन विवाह के लिए उनपर ही लगाया था। उन्होंने किसी और पुरुष को अपना पति बनाने के लिए नहीं चुना। यह एक महान विचार है क्योंकि महिलाओं का मनोविज्ञान कहता है कि जब कोई महिला पहली बार किसी पुरुष को अपना दिल देती है, तो उसके लिए इसे वापस लेना बहुत मुश्किल होता है। साथ ही, उन्होंने पहले शादी नहीं की थी; वह एक कुंवारी लड़की थी। इन सभी विचारों ने कार्दम मुनि को उन्हें स्वीकार करने के लिए राजी किया। इसलिए उन्होंने कहा, "हां, मैं विवाह के धार्मिक नियमों के तहत आपकी बेटी को स्वीकार करूंगा।" विवाह विभिन्न प्रकार के होते हैं, जिनमें से प्रथम श्रेणी के विवाह में एक उपयुक्त वर को बेटी के लिए आमंत्रित किया जाता है, उसे दान में दिया जाता है, अच्छे कपड़े पहनाए जाते हैं और गहनों से सजाया जाता है, साथ ही पिता के साधनों के अनुसार दहेज दिया जाता है। अन्य प्रकार के विवाह भी होते हैं, जैसे कि गंधर्व विवाह और प्रेम विवाह, जिन्हें विवाह के रूप में भी स्वीकार किया जाता है। यहां तक कि अगर किसी का जबरन अपहरण कर लिया जाता है और बाद में उसे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, तो उसे भी स्वीकार किया जाता है। लेकिन कार्दम मुनि ने प्रथम श्रेणी के विवाह को स्वीकार किया क्योंकि पिता इच्छुक थे और बेटी योग्य थी। उसने कभी किसी और को अपना दिल नहीं दिया था। इन सभी विचारों ने कार्दम मुनि को स्वायंभुव मनु की पुत्री को स्वीकार करने के लिए सहमत कर लिया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥