तावत्प्रसन्नो भगवान् पुष्कराक्ष: कृते युगे ।
दर्शयामास तं क्षत्त: शाब्दं ब्रह्म दधद्वपु: ॥ ८ ॥
अनुवाद
तब सतयुग में कमल-नयनों वाले परम पुरुषोत्तम भगवान ने प्रसन्न होकर कर्दम मुनि को अपने दिव्य रूप के दर्शन कराए, जिसे केवल वेदों के माध्यम से ही समझा जा सकता है।
Then in Satyayuga, the lotus-eyed Purna Purushottama God became pleased and showed his divine form to Kardama Muni, which can be known only through the Vedas.
तात्पर्य
यहाँ दो बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं। पहली बात यह कि कर्दम मुनि ने सत्य-युग की शुरुआत में योग साधना द्वारा सफलता प्राप्त की, जब लोग एक लाख वर्षों तक जीवित रहते थे। कर्दम मुनि ने सफलता प्राप्त की, और प्रभु उनसे प्रसन्न होकर उन्हें अपना वह रूप दिखाया जो काल्पनिक नहीं है। कई बार निराकारवादी सलाह देते हैं कि व्यक्ति मनमाने तरीके से किसी भी रूप पर अपना मन केंद्रित कर सकता है जिसकी वह कल्पना करता है या जो उसे पसंद आता है। लेकिन यहाँ बहुत स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रभु ने कर्दम मुनि को अपनी दिव्य कृपा से जो रूप दिखाया है उसका वर्णन वैदिक साहित्य में किया गया है। शब्दं ब्रह्म: प्रभु के रूप स्पष्ट रूप से वैदिक साहित्य में बताए गए हैं। कर्दम मुनि ने ईश्वर के किसी काल्पनिक रूप की खोज नहीं की, जैसा कि बदमाशों ने आरोप लगाया है; उन्होंने वास्तव में प्रभु के शाश्वत, आनंदमय और पारलौकिक रूप को देखा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥