उस साधना काल में कर्दम मुनि ने समाधि लगाकर भक्ति के द्वारा श्रीभगवान की आराधना की, जो शरणागतों को तुरंत सभी वर प्रदान करते हैं।
During his meditation period, Kardama Muni, through his devotion, worshipped Lord Shri Bhagwan, who instantly grants all boons to those who surrender to him.
तात्पर्य
यहां ध्यान के महत्व का वर्णन किया गया है। कार्दम मुनि ने सर्वोच्च व्यक्तित्व ईश्वर, हरि को प्रसन्न करने के लिए दस हज़ार सालों तक रहस्यमय योग ध्यान का अभ्यास किया। इसलिये, कोई योग का अभ्यास करता है या ईश्वर को पाने के लिये सोचता और शोध करता है, उसके प्रयासों को भक्ति की प्रक्रिया के साथ मिलाया जाना चाहिए। भक्ति के बिना, कुछ भी परिपूर्ण नहीं हो सकता। पूर्णता और साक्षात्कार का लक्ष्य सर्वोच्च व्यक्तित्व ईश्वर है। भागवद-गीता के छठे अध्याय में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो लगातार कृष्ण चेतना में लगा रहता है वह सबसे श्रेष्ठ योगी है। ईश्वर की आकृति, हरि, अपने समर्पित भक्त की इच्छाओं को भी पूरा करते हैं। वास्तविक सफलता प्राप्त करने के लिए, हरि या कृष्ण के चरण कमलों को समर्पण करना होता है। भक्ति सेवा, या कृष्ण चेतना में संलग्नता, प्रत्यक्ष तरीका है, और अन्य सभी तरीके, हालांकि अनुशंसित हैं, अप्रत्यक्ष हैं। इस कलियुग में प्रत्यक्ष तरीका अप्रत्यक्ष की तुलना में विशेष रूप से अधिक व्यवहार्य है क्योंकि लोग कम जीते हैं, उनकी बुद्धि खराब होती है, और वे कई दुखद अशांति से शर्मिंदा और परेशान हैं। इसलिए भगवान चैतन्य ने सबसे बड़ा वरदान दिया है: इस युग में आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता प्राप्त करने के लिए किसी को केवल ईश्वर के पवित्र नाम का जाप करना होगा। शब्द संप्रदा हरिम का अर्थ है कि कार्दम मुनि ने विभिन्न तरीकों से अपनी भक्ति सेवा से सर्वोच्च व्यक्तित्व ईश्वर, हरि को संतुष्ट किया। भक्ति सेवा को क्रिया-योगेन शब्द द्वारा भी व्यक्त किया गया है। कार्दम मुनि ने न केवल ध्यान किया, बल्कि भक्ति सेवा में भी लगे रहे; योग अभ्यास या ध्यान में पूर्णता प्राप्त करने के लिए, किसी को श्रवण, जप, स्मरण आदि द्वारा भक्ति सेवा में कार्य करना चाहिए। स्मरण भी ध्यान है। परंतु किसको याद किया जाना है? सर्वोच्च व्यक्तित्व ईश्वर को याद रखना चाहिए। किसी को न केवल सर्वोच्च व्यक्ति को याद रखना चाहिए; भगवान की गतिविधियों के बारे में सुनना चाहिए और उनकी महिमा का जाप करना चाहिए। यह जानकारी आधिकारिक शास्त्रों में है। विभिन्न प्रकार की भक्ति सेवा करने में दस हजार सालों तक खुद को लगाने के बाद, कार्दम मुनि ने ध्यान की सिद्धि प्राप्त की, लेकिन यह कलयुग में संभव नहीं है, जिसमें सौ साल तक जीना भी बहुत मुश्किल है। वर्तमान क्षण में, कौन योग नियमों और विनियमों के कठोर प्रदर्शन में सफल होगा? इसके अलावा, पूर्णता केवल उन्हीं को प्राप्त होती है जो समर्पित आत्माएं हैं। जहां सर्वोच्च व्यक्तित्व ईश्वर का कोई उल्लेख नहीं है, वहां समर्पण कहां है? और जहां सर्वोच्च व्यक्तित्व ईश्वर पर कोई ध्यान नहीं है, वहां योग अभ्यास कहां है? दुर्भाग्य से, इस युग में लोग, विशेष रूप से जो राक्षसी प्रकृति के हैं, वे ठगे जाना चाहते हैं। इस प्रकार सर्वोच्च व्यक्तित्व ईश्वर महान धोखेबाज़ भेजते हैं जो उन्हें योग के नाम पर गुमराह करते हैं और अपने जीवन को बेकार और बर्बाद कर देते हैं। इसलिए भागवद-गीता में (सोलहवें अध्याय, श्लोक 17 में) यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्व-निर्मित अधिकार वाले बदमाश, अवैध रूप से एकत्रित धन से भरे होने के कारण, आधिकारिक पुस्तकों का पालन किए बिना योग करते हैं। वे उस पैसे पर बहुत गर्व करते हैं जिसे उन्होंने उन निर्दोषों से लूटा है जो ठगा जाना चाहते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥