श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.21.6 
मैत्रेय उवाच
प्रजा: सृजेति भगवान् कर्दमो ब्रह्मणोदित: ।
सरस्वत्यां तपस्तेपे सहस्राणां समा दश ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
महान ऋषि मैत्रेय ने उत्तर दिया – प्रभु ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार लोकों में संतान उत्पन्न करने के लिए पूजनीय कर्दम मुनि ने सरस्वती नदी के किनारे दस हज़ार वर्षों तक तपस्या की।
 
The great sage Maitreya replied: After receiving the order from Lord Brahma to produce progeny in the worlds, the revered Kardama Muni performed penance for ten thousand years on the banks of the Saraswati River.
तात्पर्य
यह यहाँ समझा जाता है कि कार्दम मुनि ने पूर्णता प्राप्त करने से पहले दस हज़ार वर्षों तक योग का ध्यान किया था। इसी तरह, हमारे पास जानकारी है कि वाल्मीकि मुनि ने भी पूर्णता प्राप्त करने से पहले साठ हज़ार वर्षों तक योग का अभ्यास किया था। इसलिए, योग का अभ्यास उन व्यक्तियों द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है जिनके पास जीवन की बहुत लंबी अवधि है, जैसे एक लाख वर्ष; इस तरह से योग में पूर्णता प्राप्त करना संभव है। अन्यथा, वास्तविक पूर्णता प्राप्त करने की कोई संभावना नहीं है। विनियमों का पालन करना, इन्द्रियों को नियंत्रित करना और विभिन्न बैठने की मुद्राओं का अभ्यास करना मात्र प्रारंभिक अभ्यास हैं। हम नहीं जानते कि लोग कैसे उस फर्ज़ी योग प्रणाली से मोहित हो सकते हैं जिसमें यह कहा गया है कि प्रतिदिन केवल पंद्रह मिनट ध्यान करने से ही व्यक्ति भगवान के साथ एक होने की पूर्णता प्राप्त कर सकता है। यह युग (कलियुग) झांसा देने और झगड़ा करने का युग है। वास्तव में, ऐसी तुच्छ प्रस्तावों से योग की पूर्णता प्राप्त करने की कोई संभावना नहीं है। वैदिक साहित्य, ज़ोर देने के लिए, स्पष्ट रूप से तीन बार कहता है कि इस कलियुग में - कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव - प्रभु के पवित्र नाम का जाप करने, हरिनाम के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है, कोई अन्य विकल्प नहीं है, कोई अन्य विकल्प नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)