श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  3.21.55 
अधर्मश्च समेधेत लोलुपैर्व्यङ्कुशैर्नृभि: ।
शयाने त्वयि लोकोऽयं दस्युग्रस्तो विनङ्‍क्ष्यति ॥ ५५ ॥
 
 
अनुवाद
यदि आप संपूर्ण विश्व की अवस्था और परिस्थितियों के बारे में विचार करना छोड़ देंगे (निश्चिन्त होकर चुपचाप बैठ जाएँगे), तो अन्याय और बुराइयाँ फलने-फूलने लगेंगी, क्योंकि जो लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ धन और संपत्ति के पीछे भागते हैं, उन्हें कोई रोकने वाला नहीं होगा । ऐसे दुराचारी लोग आक्रमण करेंगे और यह संसार नष्ट हो जाएगा ।
 
यदि आप संपूर्ण विश्व की अवस्था और परिस्थितियों के बारे में विचार करना छोड़ देंगे (निश्चिन्त होकर चुपचाप बैठ जाएँगे), तो अन्याय और बुराइयाँ फलने-फूलने लगेंगी, क्योंकि जो लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ धन और संपत्ति के पीछे भागते हैं, उन्हें कोई रोकने वाला नहीं होगा । ऐसे दुराचारी लोग आक्रमण करेंगे और यह संसार नष्ट हो जाएगा ।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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