यदि आप अपने विजयी रत्नजड़ित रथ पर नहीं चढ़ेंगे, जिसकी उपस्थिति मात्र से अपराधी थर्रा उठते हैं, यदि आप अपने धनुष की भयावह चाप से तीखी आवाज़ें पैदा नहीं करेंगे और यदि आप तेजस्वी सूर्य की तरह विशाल सेना के साथ घूमते हुए पूरे संसार में नहीं जाएंगे जिसके पैरों के धक्के से पृथ्वी का मंडल काँपने लगेगा, तो प्रभु द्वारा बनाई गई समस्त वर्णों और आश्रमों की नैतिक व्यवस्था को दुष्ट और बदमाश नष्ट कर देंगे।
If you do not ride on your victorious jeweled chariot whose mere presence frightens criminals, if you do not sound the loud sound of your bow and if you do not travel throughout the world like the radiant Sun with a huge army whose footsteps shake the earth, then the system of all the varnas and ashramas created by the Lord Himself would be destroyed by thieves and robbers.
तात्पर्य
एक जिम्मेदार राजा का यह कर्तव्य है कि वह मानव समाज में सामाजिक और आध्यात्मिक व्यवस्थाओं की रक्षा करे। आध्यात्मिक व्यवस्थाएँ चार आश्रमों में विभाजित हैं - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास - और सामाजिक व्यवस्था, काम और योग्यता के अनुसार, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों से मिलकर बनी है। ये सामाजिक व्यवस्थाएँ, काम और योग्यता के विभिन्न श्रेणियों के अनुसार, भागवद-गीता में वर्णित हैं। दुर्भाग्य से, जिम्मेदार राजाओं द्वारा उचित सुरक्षा की कमी के कारण, सामाजिक और आध्यात्मिक व्यवस्थाओं की प्रणाली अब एक वंशानुगत जाति प्रणाली बन गई है। परंतु यह वास्तविक प्रणाली नहीं है। मानव समाज का अर्थ है वह समाज जो आध्यात्मिक साक्षात्कार की ओर प्रगति कर रहा है। सबसे उन्नत मानव समाज को आर्य के रूप में जाना जाता था; आर्य उन लोगों को संदर्भित करता है जो आगे बढ़ रहे हैं। तो प्रश्न है, "कौन सा समाज आगे बढ़ रहा है?" उन्नति का मतलब यह नहीं है कि अनावश्यक रूप से भौतिक "आवश्यकताएं" पैदा करना और इस प्रकार मानवीय ऊर्जा को तथाकथित भौतिक सुख-सुविधाओं पर बढ़ाना। वास्तविक प्रगति आध्यात्मिक साक्षात्कार की ओर प्रगति है, और इस उद्देश्य की ओर कार्य करने वाले समुदाय को आर्य सभ्यता के रूप में जाना जाता था। बुद्धिमान पुरुष, ब्राह्मण, जैसे कि कर्दम मुनि, आध्यात्मिक कारण को आगे बढ़ाने में लगे हुए थे, और सम्राट स्वायंभुव जैसे क्षत्रिय देश पर शासन करते थे और यह सुनिश्चित करते थे कि आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए सभी सुविधाएँ अच्छी तरह से उपलब्ध हों। यह राजा का कर्तव्य है कि वह पूरे देश की यात्रा करे और यह देखे कि सब कुछ क्रम में है। चार वर्णों और आश्रमों के आधार पर भारतीय सभ्यता विदेशियों पर उसकी निर्भरता के कारण ख़राब हो गई, या उन लोगों के कारण जो वर्णाश्रम की सभ्यता का पालन नहीं करते थे। इस प्रकार वर्णाश्रम व्यवस्था अब जाति व्यवस्था में बदल गई है। चार वर्णों और चार आश्रमों की संस्था को भगवद्-रचित के रूप में पुष्टि की गई है, जिसका अर्थ है "भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व द्वारा डिज़ाइन किया गया।" भागवद-गीता में इसकी भी पुष्टि की गई है: चतु-वर्ण्यम मया सृष्टम। भगवान कहते हैं कि चार वर्णों और चार आश्रमों की संस्था "मेरे द्वारा बनाई गई है।" भगवान द्वारा बनाई गई किसी भी चीज़ को बंद या ढका नहीं जा सकता है। वर्णों और आश्रमों के विभाजन अपने मूल रूप में या अपमानित रूप में बने रहेंगे, लेकिन क्योंकि वे भगवान द्वारा बनाए गए हैं, सर्वोच्च व्यक्तित्व के देवता को बुझाया नहीं जा सकता है। वे सूर्य की तरह हैं, जो ईश्वर की रचना है, और इसलिए बने रहेंगे। बादलों से ढका हो या साफ आसमान में, सूर्य अस्तित्व में रहेगा। इसी तरह, जब वर्णाश्रम व्यवस्था अपमानित हो जाती है, तो यह वंशानुगत जाति व्यवस्था के रूप में प्रकट होता है, लेकिन प्रत्येक समाज में पुरुषों का एक बुद्धिमान वर्ग, एक मार्शल वर्ग, एक व्यापारी वर्ग और एक श्रमिक वर्ग होता है। जब उन्हें वैदिक सिद्धांतों के अनुसार समुदायों के बीच सहयोग के लिए विनियमित किया जाता है, तो शांति और आध्यात्मिक प्रगति होती है। लेकिन जब जाति व्यवस्था में घृणा और कदाचार और आपसी अविश्वास होता है, तो पूरी व्यवस्था अपमानित हो जाती है, और जैसा कि यहाँ कहा गया है, यह एक निराशाजनक स्थिति पैदा करता है। वर्तमान समय में, पूरा विश्व इतनी अधिक रुचियों को अधिकार देने के कारण इस दयनीय स्थिति में है। यह वर्णों और आश्रमों की चार जातियों के पतन के कारण है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥