उस सबसे पवित्र स्थान में प्रवेश कर अपनी पुत्री के साथ ऋषि के पास जाकर, पहले राजा, स्वायंभुव मनु ने देखा कि ऋषि अपने आश्रम में बैठे थे, उन्होंने अभी-अभी पवित्र अग्नि में आहुतियाँ देकर आहुतियां डाली थीं। उनका शरीर बहुत चमक रहा था। यद्यपि वे लंबे समय से कठोर तपस्या में लगे हुए थे, लेकिन वे क्षीण नहीं थे, क्योंकि भगवान ने उन पर कृपा की थी और उन्होंने भगवान के चन्द्रमा जैसे स्निग्ध अमृतमय शब्दों को भी सुना था। ऋषि लम्बे थे, उनकी आंखें बड़ी-बड़ी थीं, जैसे कमल-दल हों और उनके सिर पर जटाएँ थीं। वे चिथड़े पहने हुए थे। स्वायंभुव मनु उनके पास गए और उन्होंने देखा कि वह कुछ धूल-धूसरित थे, जैसे कोई बिना तराशा हुआ मणि हो।
The primeval king Svayambhuva Manu entered that sacred place with his daughter and saw that the sage had just sat in his hermitage after offering oblations in the sacred fire. His body was very radiant. Though he had been engaged in austerity for a long time, he was not at all weak, because the Lord had looked kindly upon him and he had drunk the moon-like nectar-like words of the Lord. The sage was tall, his eyes were large like lotus petals and he had matted locks on his head. He was dressed in rags. Svayambhuva Manu went to him and saw that he was covered with dust like an uncut gem.
तात्पर्य
यहां ब्रह्मचारी-योगी के कुछ वर्णन दिए गए हैं। प्रातःकाल, आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले ब्रह्मचारी का पहला कर्तव्य होता है हुता-हुताशन, अर्थात परम भगवान को नैवेद्य अर्पित करना। ब्रह्मचर्य में लगे लोग सुबह सात या नौ बजे से पहले नहीं सो सकते। उन्हें प्रातःकाल सूर्योदय से कम से कम डेढ़ घंटे पहले उठना चाहिए और हवन करना चाहिए या इस कलियुग में उन्हें भगवान का पवित्र नाम 'हरे कृष्ण' का जाप करना चाहिए। जैसा कि भगवान चैतन्य ने कहा है ''कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा'' अर्थात भगवान के पवित्र नाम के जप के अलावा कलियुग में कोई अन्य विकल्प नहीं है, कोई अन्य विकल्प नहीं है, कोई अन्य विकल्प नहीं है। ब्रह्मचारी को प्रातःकाल उठकर तत्परता से स्नान करके भगवान का पवित्र नाम जप करना चाहिए। ऋषि की शक्ल-सूरत से ही पता चलता था कि उन्होंने महान तप किया है, ब्रह्मचर्य के व्रत को निभाने वाले की यही निशानी होती है। यदि कोई कोई अन्यथा रहता है, तो यह उसके चेहरे और शरीर पर दिखने वाली कामुकता से प्रकट होगा। विद्योतमानम' शब्द यह दर्शाता है कि ब्रह्मचारी के लक्षण शरीर से प्रकट होते थे। यह इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति ने योग में बड़ी तपस्या की है। एक शराबी या धूम्रपान करने वाला या कामुक व्यक्ति योग का अभ्यास करने के योग्य कभी नहीं हो सकता। आमतौर पर योगी बहुत दुबले-पतले दिखते हैं क्योंकि वे आराम से नहीं रहते हैं, लेकिन कर्दम मुनि दुबले-पतले नहीं थे, क्योंकि उन्होंने भगवान को साक्षात् रूप में देखा था। यहाँ शब्द 'स्निग्धापांगा वलोकनात' का अर्थ है कि वह इतने भाग्यशाली थे कि उन्होंने भगवान को साक्षात् रूप में देखा। वह स्वस्थ दिखते थे क्योंकि उन्हें सीधे भगवान के कमल मुख से अमृततुल्य ध्वनि कंपन प्राप्त हुए थे। इसी तरह, जो लोग भगवान के पवित्र नाम 'हरे कृष्ण' के अलौकिक ध्वनि कंपन को सुनते हैं, उनके स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। हमने वास्तव में देखा है कि अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ से जुड़े कई ब्रह्मचारी और गृहस्थ अपने स्वास्थ्य में सुधार हुए है, और उनके चेहरों पर एक चमक आ गई है। यह आवश्यक है कि आध्यात्मिक उन्नति में लगे ब्रह्मचारी बहुत स्वस्थ और तेजस्वी दिखें। ऋषि की तुलना एक बिना पॉलिश किए गए मणि से बहुत ही उपयुक्त है। भले ही खदान से अभी निकाला गया रत्न अपरिष्कृत दिखता हो, लेकिन रत्न की चमक को रोका नहीं जा सकता। इसी तरह, हालांकि कर्दम ठीक से कपड़े नहीं पहने थे और उनका शरीर ठीक से साफ नहीं था, लेकिन उनकी समग्र उपस्थिति रत्न की तरह थी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥