पुण्यद्रुमलताजालै: कूजत्पुण्यमृगद्विजै: ।
सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं वनराजिश्रियान्वितम् ॥ ४० ॥
अनुवाद
सरोवर का किनारा पवित्र वृक्षों और लताओं के समूहों से घिरा हुआ था। ये वृक्ष और लताएँ सभी ऋतुओं में फलों और फूलों से भरे रहते थे। इन वृक्षों और लताओं में पवित्र पशु और पक्षी निवास करते थे और तरह-तरह की आवाजें निकालते थे। यह स्थान वृक्षों के कुंजों की शोभा से सजा हुआ था।
The banks of the lake were surrounded by groups of sacred trees and creepers, which were laden with fruits and flowers in all seasons and in which sacred animals and birds made their nests and chirped in various ways. This place was adorned with the beauty of groves of trees.
तात्पर्य
यहाँ कहा गया है कि बिंदु सरोवर धर्ममय वृक्षों और पक्षियों से घिरा था। जिस प्रकार मानव समाज में कई प्रकार के मनुष्य होते हैं, कुछ धर्ममय और पुण्यात्मा तो कुछ अधर्मी और पापी, उसी प्रकार वृक्षों और पक्षियों में भी धर्ममय और अधर्ममय होते हैं। जो वृक्ष अच्छे फल या फूल नहीं देते वे अधार्मिक माने जाते हैं और जो पक्षी बहुत ही गंदे होते हैं, जैसे कौव्वे, वे अधार्मिक माने जाते हैं। बिंदु सरोवर के आसपास के इलाके में कोई भी अधार्मिक पक्षी या वृक्ष नहीं था। हर वृक्ष फल और फूल देता था और हर पक्षी भगवान के गुण गाता था - हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥