श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.21.34 
निरीक्षतस्तस्य ययावशेष-
सिद्धेश्वराभिष्टुतसिद्धमार्ग: ।
आकर्णयन् पत्ररथेन्द्रपक्षै-
रुच्चारितं स्तोममुदीर्णसाम ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
देखते-देखते भगवान उस मार्ग से चले गए जो वैकुण्ठ की ओर जाता है और जिसकी प्रशंसा महान मुक्त आत्माएँ करती हैं। जैसे ही गरुड़ फड़फड़ाते हुए अपने पंखों से सामवेद के मंत्रों की ध्वनि उठा रहा था, मुनि खड़े हुए सुनते रहे।
 
While the sage Kardama stood and looked on, the Lord departed from the path leading to Vaikuntha, which is praised by all great liberated souls. The sage stood and listened to the sound of the invocation of the Sama Veda, which was resonating from the flapping wings of Garuda, the vehicle of the Lord.
तात्पर्य
वैदिक साहित्यानुसार वैष्णव पक्षी गरुड़ की दो पंखों-बृहत और रथंतर में दो सामावेदों का विभाजन है, जो ईश्वर को हर जगह ले जाते हैं। गरुड़ भगवान के वाहन के रूप में कार्य करता है, इसलिए उन्हें सभी वाहनों के पारलौकिक राजकुमार माना जाता है। अपने दो पंखों के साथ गरुड़ ने एक प्रकार का सामावेद बजाना शुरू किया, जिसे भगवान को शांत करने के लिए महान संतों द्वारा जप किया जाता है। भगवान की पूजा ब्रह्मा, भगवान शिव, गरुड़ और अन्य देवताओं द्वारा मंत्रों के चयन के साथ की जाती है, और महान संतों उनकी पूजा वैदिक साहित्यों के मंत्रों, जैसे उपनिषद और सामवेद से करते हैं। भक्त के सामने, जब एक महान भक्त ईश्वर का गरुड़ अपने पंखों को हिलाते हैं, तो उन्हें ये सामवेद उच्चारण खुद-ब-खुद सुनाई देते हैं। यहाँ स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि ऋषि कर्दम उस मार्ग को देखने लगे जिसके द्वारा ईश्वर को वैकुंठ ले जाया जा रहा है। इस तरह ये पुष्टि होती है कि प्रभु अपने निवास वैकुंठ, आध्यात्मिक आकाश से अवतरित होते हैं, और गरुड़ द्वारा वहन किए जाते हैं। वैकुंठ की ओर जाने वाला मार्ग को साधारण श्रेणी के पारलौकिकवादियों द्वारा उपासना नहीं की जाती है। केवल वही लोग जो भौतिक बंधन से मुक्त हैं भगवान के भक्त बन सकते हैं। जो लोग भौतिक बंधन से मुक्त नहीं हैं वे पारलौकिक भक्ती सेवा को नहीं समझ सकते हैं। यह भगवद-गीता में स्पष्ट रूप से बताया गया है, यदि आसक्त भक्ति से रहित भी कर्म होते हैं तो वे मनुष्यों को भवसागर से पार कर देते हैं। ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं जो भौतिक बंधन से मुक्ति के लिए प्रयास करके पूर्णता प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं, और जो वास्तव में मुक्त होते हैं उन्हें ब्रह्म-भूत या सिद्ध कहा जाता है। केवल सिद्ध, या भौतिक बंधन से मुक्त व्यक्ति ही भक्त बन सकते हैं। यह भगवद-गीता में भी पुष्टि की गई है: कोई भी व्यक्ति जो कृष्ण भावना, या भक्तिपूर्ण सेवा में लगा हुआ है, वह पहले से ही भौतिक प्रकृति के तरीकों के प्रभाव से मुक्त है। यहाँ यह भी पुष्टि की गई है कि भक्तिपूर्ण सेवा का मार्ग मुक्त व्यक्तियों द्वारा उपासित होता है, न कि सशर्त आत्माओं द्वारा। सशर्त आत्मा ईश्वर की भक्ति सेवा को समझ नहीं सकती है। कर्दम मुनि एक मुक्त आत्मा थे, जिन्होंने भगवान को व्यक्तिगत रूप से देखा था, आमने-सामने। इसमें कोई संदेह नहीं था कि वह मुक्त हो गया था, और इस प्रकार वह गरुड़ को वैकुण्ठ के रास्ते पर भगवान को ले जाते हुए देख सकता था और उसके पंखों के फड़फड़ाने की आवाज से हरे कृष्ण का उच्चारण होता हुआ सुन सकता था, जो सामवेद का सार है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)