भगवान के विभिन्न प्रकार के अवतार हैं। वे एक हैं, लेकिन वे कई बन गए हैं। वे स्वयं को दो अलग-अलग विस्तार में विभाजित करते हैं, एक को कला कहा जाता है और दूसरा विंभिन्नांश। साधारण जीवित संस्थाओं को विंभिन्नांश विस्तार कहा जाता है, और विष्णु-तत्त्व के असीमित विस्तार, जैसे वामन, गोविंद, नारायण, प्रद्युम्न, वासुदेव और अनंत, को स्वांश-कला कहा जाता है। स्वांश एक सीधा विस्तार को संदर्भित करता है, और कला मूल भगवान के विस्तार से एक विस्तार को दर्शाता है। बलदेव कृष्ण का विस्तार है, और बलदेव से अगला विस्तार संकर्षण है; इस प्रकार संकर्षण कला है, लेकिन बलदेव स्वांश हैं। हालाँकि, उनमें कोई अंतर नहीं है। इसे ब्रह्म-संहिता (5.46) में बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है: दीपार्चिर एव हि दशांतर्मभ्युपेतया। एक मोमबत्ती से कोई दूसरी मोमबत्ती जला सकता है, दूसरे से तीसरी और फिर चौथी, और इस तरह से कोई हजारों मोमबत्तियों को जला सकता है, और कोई भी मोमबत्ती प्रकाश वितरित करने में दूसरे से कमतर नहीं है। हर मोमबत्ती में पूरी मोमबत्ती की शक्ति होती है, लेकिन फिर भी यह अंतर है कि एक मोमबत्ती पहली है, दूसरी दूसरी, दूसरी तीसरी और दूसरी चौथी। इसी प्रकार, भगवान के तत्काल विस्तार और उसके द्वितीयक विस्तार के बीच कोई अंतर नहीं है। भगवान के नामों को बिल्कुल उसी तरह माना जाता है। चूँकि भगवान पूर्ण हैं, इसलिए उनका नाम, उनका रूप, उनके मनोरंजन, उनका सामान और उनके गुणों में सभी में समान क्षमता है। पूर्ण संसार में, कृष्ण नाम भगवान का अलौकिक ध्वनि प्रतिनिधित्व है। उनके गुणों, नाम, रूप, आदि के बीच क्षमता में कोई अंतर नहीं है। अगर हम भगवान के नाम का जाप करते हैं, हरे कृष्ण, तो इसमें उतनी ही क्षमता है जितनी खुद भगवान में है। भगवान के उस रूप के बीच क्षमता में कोई अंतर नहीं है जिसकी हम पूजा करते हैं और मंदिर में भगवान के रूप में है। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि कोई भगवान की गुड़िया या मूर्ति की पूजा कर रहा है, भले ही दूसरे इसे मूर्ति मानते हों। क्योंकि क्षमता में कोई अंतर नहीं है, भगवान की मूर्ति या भगवान की स्वयं पूजा करने से एक ही परिणाम प्राप्त होता है। यही कृष्ण चेतना का विज्ञान है।
