श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.21.31 
कृत्वा दयां च जीवेषु दत्त्वा चाभयमात्मवान् ।
मय्यात्मानं सह जगद् द्रक्ष्यस्यात्मनि चापि माम् ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
सभी जीवों के प्रति दयालुता दिखाकर तुम आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर सकोगे। फिर सबको भयमुक्त करने का वचन देने से तुम अपने सहित समस्त जगत को मुझमें और मुझे अपने में स्थित देख सकोगे।
 
By being kind to all beings you will be able to achieve Self-realization; then, by granting protection to all, you will see the entire world including yourself in Me and Me in you.
तात्पर्य
प्रत्येक जीव की आत्मज्ञान की सरल प्रक्रिया का वर्णन यहाँ किया गया है। सबसे पहले जो समझना होगा वो यह है कि यह संसार सर्वोच्च इच्छा का परिणाम है। सर्वोच्च प्रभु के साथ इस संसार की एक अनन्यता है। इस अनन्यता को भ्रांत ढंग से निराकारवादी स्वीकार करते हैं; वे कहते हैं कि सर्वोच्च पूर्ण सत्य स्वयं को ब्रह्मांड में परिवर्तित कर देता है, और अपना अलग अस्तित्त्व खो देता है। इस प्रकार वे संसार और उसमें सब कुछ को प्रभु स्वीकार करते हैं। यह सर्वेश्वरवाद है, जिसमें सब कुछ प्रभु माना जाता है। यह निराकारवादियों का दृष्टिकोण है। लेकिन जो लोग प्रभु के निजी भक्त है वे सब कुछ को सर्वोच्च प्रभु की संपत्ति मानते हैं। सब कुछ, जो कुछ भी हम देखते हैं, वो सर्वोच्च प्रभु की अभिव्यक्ति है; इसलिए, सब कुछ प्रभु की सेवा में लगाया जाना चाहिए। यही एकता है। निराकारवादी और भक्त के बीच का अंतर यह है कि निराकरवादी प्रभु के अलग अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते है, जबकि भक्त प्रभु को स्वीकार करते हैं; वो समझते हैं कि हालाँकि वो स्वयं को कई प्रकार से वितरित करते हैं, उनका अपना अलग व्यक्तिगत अस्तित्व है। इसी को भगवद-गीता में वर्णित किया गया है: "मैं अपने निराकार रूप में पूरे ब्रह्मांड में फैला हुआ हूँ। हर चीज़ मुझ पर टिकी हुई है, लेकिन मैं मौजूद नहीं हूँ।" सूर्य और धूप के संबंध में एक अच्छा उदाहरण है। सूर्य अपनी धूप द्वारा पूरे ब्रह्मांड में फैला हुआ है, और सभी ग्रह धूप पर आधारित हैं। लेकिन सभी ग्रह सूर्य ग्रह से अलग हैं; इसलिए कोई यह नहीं कह सकता कि क्योंकि ग्रह धूप पर आधारित हैं, तो यह ग्रह भी सूर्य हैं। इसी तरह, निराकार या सर्वेश्वरवाद का विचार कि सब कुछ ईश्वर है, बहुत बुद्धिमानी भरा प्रस्ताव नहीं है। वास्तविक स्थिति, जैसा कि स्वयं भगवान ने समझाई है, यह है कि हालाँकि उनके बिना कुछ भी अस्तित्व में नहीं हो सकता, यह सत्य नहीं है कि सब कुछ वो स्वयं हैं। वो हर चीज से अलग हैं। तो यहाँ भी भगवान कहते हैं, "तुम दुनिया में सब कुछ को मुझसे अलग नहीं पाओगे।" इसका मतलब यह है कि हर चीज को प्रभु की ऊर्जा का परिणाम माना जाना चाहिए, और इसलिए हर चीज़ को प्रभु की सेवा में लगाया जाना चाहिए। अपनी ऊर्जा का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए करना चाहिए। यही ऊर्जा की परिपूर्णता है। यदि कोई दयालु है तो इस ऊर्जा का उपयोग वास्तविक स्वार्थ के लिए किया जा सकता है। कृष्ण चेतना में एक व्यक्ति, प्रभु का एक भक्त, हमेशा दयालु होता है। वह संतुष्ट नहीं है कि केवल वही स्वंय भक्त हैं, बल्कि वह भक्ति सेवा के ज्ञान को सभी में वितरित करने का प्रयास करता है। प्रभु के कई भक्त हैं जिन्होंने सामान्य लोगों को प्रभु की भक्ति सेवा वितरित करने में कई जोखिमों का सामना किया। ऐसा किया जाना चाहिए। यह भी कहा जाता है कि जो व्यक्ति प्रभु के मंदिर जाता है और बहुत भक्ति के साथ पूजा करता है, लेकिन जो सामान्य लोगों के प्रति सहानुभूति नहीं दिखाता या अन्य भक्तों का सम्मान नहीं करता, उसे तृतीय श्रेणी का भक्त माना जाता है। दूसरी श्रेणी का भक्त वह है जो पतित आत्मा के प्रति दयालु और करुणामय है। दूसरी श्रेणी का भक्त हमेशा प्रभु के एक शाश्वत सेवक के रूप में अपनी स्थिति को पहचानता है; इसलिए वह प्रभु के भक्तों के साथ मित्रता करता है, भक्ति सेवा सिखाने में आम जनता के प्रति करुणामय कार्य करता है, और अधर्मियों से सहयोग करने या जुड़ने से इंकार करता है। जब तक कोई प्रभु के प्रति अपनी भक्ति सेवा में सामान्य लोगों के प्रति दयालु नहीं है, तब तक वह तृतीय श्रेणी का भक्त है। प्रथम श्रेणी का भक्त प्रत्येक जीवित प्राणी को आश्वासन देता है कि इस भौतिक अस्तित्व से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है: "आइए हम कृष्ण चेतना में रहें और भौतिक अस्तित्व की अज्ञानता पर विजय प्राप्त करें।"

यहाँ उल्लेख किया गया है कि कार्दम मुनि को भगवान द्वारा अपने गृहस्थ जीवन में बहुत दयालु और उदार रहने का निर्देश दिया गया था और अपने त्यागी जीवन में लोगों को आश्वासन देना था। एक संन्यासी, जीवन के त्यागी आदेश में से एक, लोगों को ज्ञान देने के लिए होता है। उसे घर-घर जाकर ज्ञान प्राप्त करने जाना चाहिए। गृहस्थ, माया के मंत्र से, पारिवारिक मामलों में लीन हो जाता है और कृष्ण के साथ अपने संबंध को भूल जाता है। यदि वह भूल में ही मर जाता है, जैसे बिल्लियों और कुत्तों की तरह, तो उसका जीवन नष्ट हो जाता है। इसलिए, एक संन्यासी का कर्तव्य है कि वह भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध के ज्ञान से भूलने वाली आत्माओं को जगाए और उन्हें भक्ति सेवा में लगाए। भक्त को गिरी हुई आत्माओं पर दया करनी चाहिए और उन्हें निडरता का आश्वासन भी देना चाहिए। जैसे ही कोई भगवान का भक्त बन जाता है, उसे विश्वास हो जाता है कि वह भगवान द्वारा संरक्षित है। भय से भय लगता है; इसलिए, निडरता से उसका क्या लेना-देना है?

सामान्य व्यक्ति को निडरता प्रदान करना दान का सबसे बड़ा कार्य है। एक संन्यासी, या जो जीवन के त्यागी क्रम में है, को गाँव-गाँव, शहर-शहर और देश-देशांतर में, जहाँ तक वह यात्रा कर सके, घर-घर भटकना चाहिए और गृहस्थों को कृष्ण चेतना के बारे में समझाना चाहिए। एक व्यक्ति जो गृहस्थ है, लेकिन एक संन्यासी द्वारा दीक्षित किया गया है, उसका कर्तव्य घर पर कृष्ण चेतना फैलाना है; जहाँ तक संभव हो, उसे अपने दोस्तों और पड़ोसियों को अपने घर बुलाना चाहिए और कृष्ण चेतना में कक्षाएँ आयोजित करनी चाहिए। एक कक्षा रखने का अर्थ है कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण करना और भगवद-गीता या श्रीमद-भागवतम से बोलना। कृष्ण चेतना फैलाने के लिए अपार साहित्य है, और प्रत्येक गृहस्थ का कर्तव्य है कि वह अपने संन्यासी आध्यात्मिक गुरु से कृष्ण के बारे में सीखे। प्रभु की सेवा में एक श्रम विभाजन है। गृहस्थ का कर्तव्य धन कमाना है क्योंकि एक संन्यासी को धन कमाने के लिए नहीं माना जाता है, बल्कि वह पूरी तरह से गृहस्थ पर निर्भर है। गृहस्थ को व्यापार या पेशे से धन कमाना चाहिए और अपनी आय का कम से कम पचास प्रतिशत कृष्ण चेतना फैलाने में खर्च करना चाहिए; पच्चीस प्रतिशत वह अपने परिवार पर खर्च कर सकता है, और पच्चीस प्रतिशत उसे आपात स्थितियों से निपटने के लिए बचाना चाहिए। यह उदाहरण रूप गोस्वामी द्वारा दिखाया गया था, इसलिए भक्तों को इसका पालन करना चाहिए।

वास्तव में, सर्वोच्च भगवान के साथ एक होना भगवान के हित से एक होना है। सर्वोच्च भगवान के साथ एक होना सर्वोच्च भगवान की तरह महान बनने का संकेत नहीं देता है। यह नामुमकिन है। भाग कभी भी संपूर्ण के बराबर नहीं होता। जीवित इकाई हमेशा एक छोटा सा हिस्सा है। इसलिए भगवान के साथ उसकी एकता यह है कि वह भगवान के एक हित में रुचि रखता है। प्रभु चाहता है कि प्रत्येक जीवित इकाई हमेशा उसके बारे में सोचे, उसका भक्त बने और हमेशा उसकी पूजा करे। यह स्पष्ट रूप से भगवद-गीता में कहा गया है: मन-मना भव मद-भक्तः। कृष्ण चाहता है कि हर कोई हमेशा उसे याद रखे। सभी को हमेशा कृष्ण को प्रणाम करना चाहिए। यह सर्वोच्च भगवान की इच्छा है, और भक्तों को उनकी इच्छा को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। चूँकि भगवान असीम हैं, इसलिए उनकी इच्छा भी असीमित है। कोई रोक-टोक नहीं है, और इसलिए भक्त की सेवा भी असीमित है। पारलौकिक संसार में प्रभु और सेवक के बीच असीमित प्रतिस्पर्धा होती है। प्रभु अपनी इच्छाओं को असीमित रूप से पूरा करना चाहता है, और भक्त भी अपनी असीमित इच्छाओं को पूरा करने के लिए उसकी सेवा करता है। प्रभु और उनके भक्त के बीच हित की एक असीमित एकता होती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)