यहाँ उल्लेख किया गया है कि कार्दम मुनि को भगवान द्वारा अपने गृहस्थ जीवन में बहुत दयालु और उदार रहने का निर्देश दिया गया था और अपने त्यागी जीवन में लोगों को आश्वासन देना था। एक संन्यासी, जीवन के त्यागी आदेश में से एक, लोगों को ज्ञान देने के लिए होता है। उसे घर-घर जाकर ज्ञान प्राप्त करने जाना चाहिए। गृहस्थ, माया के मंत्र से, पारिवारिक मामलों में लीन हो जाता है और कृष्ण के साथ अपने संबंध को भूल जाता है। यदि वह भूल में ही मर जाता है, जैसे बिल्लियों और कुत्तों की तरह, तो उसका जीवन नष्ट हो जाता है। इसलिए, एक संन्यासी का कर्तव्य है कि वह भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध के ज्ञान से भूलने वाली आत्माओं को जगाए और उन्हें भक्ति सेवा में लगाए। भक्त को गिरी हुई आत्माओं पर दया करनी चाहिए और उन्हें निडरता का आश्वासन भी देना चाहिए। जैसे ही कोई भगवान का भक्त बन जाता है, उसे विश्वास हो जाता है कि वह भगवान द्वारा संरक्षित है। भय से भय लगता है; इसलिए, निडरता से उसका क्या लेना-देना है?
सामान्य व्यक्ति को निडरता प्रदान करना दान का सबसे बड़ा कार्य है। एक संन्यासी, या जो जीवन के त्यागी क्रम में है, को गाँव-गाँव, शहर-शहर और देश-देशांतर में, जहाँ तक वह यात्रा कर सके, घर-घर भटकना चाहिए और गृहस्थों को कृष्ण चेतना के बारे में समझाना चाहिए। एक व्यक्ति जो गृहस्थ है, लेकिन एक संन्यासी द्वारा दीक्षित किया गया है, उसका कर्तव्य घर पर कृष्ण चेतना फैलाना है; जहाँ तक संभव हो, उसे अपने दोस्तों और पड़ोसियों को अपने घर बुलाना चाहिए और कृष्ण चेतना में कक्षाएँ आयोजित करनी चाहिए। एक कक्षा रखने का अर्थ है कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण करना और भगवद-गीता या श्रीमद-भागवतम से बोलना। कृष्ण चेतना फैलाने के लिए अपार साहित्य है, और प्रत्येक गृहस्थ का कर्तव्य है कि वह अपने संन्यासी आध्यात्मिक गुरु से कृष्ण के बारे में सीखे। प्रभु की सेवा में एक श्रम विभाजन है। गृहस्थ का कर्तव्य धन कमाना है क्योंकि एक संन्यासी को धन कमाने के लिए नहीं माना जाता है, बल्कि वह पूरी तरह से गृहस्थ पर निर्भर है। गृहस्थ को व्यापार या पेशे से धन कमाना चाहिए और अपनी आय का कम से कम पचास प्रतिशत कृष्ण चेतना फैलाने में खर्च करना चाहिए; पच्चीस प्रतिशत वह अपने परिवार पर खर्च कर सकता है, और पच्चीस प्रतिशत उसे आपात स्थितियों से निपटने के लिए बचाना चाहिए। यह उदाहरण रूप गोस्वामी द्वारा दिखाया गया था, इसलिए भक्तों को इसका पालन करना चाहिए।
वास्तव में, सर्वोच्च भगवान के साथ एक होना भगवान के हित से एक होना है। सर्वोच्च भगवान के साथ एक होना सर्वोच्च भगवान की तरह महान बनने का संकेत नहीं देता है। यह नामुमकिन है। भाग कभी भी संपूर्ण के बराबर नहीं होता। जीवित इकाई हमेशा एक छोटा सा हिस्सा है। इसलिए भगवान के साथ उसकी एकता यह है कि वह भगवान के एक हित में रुचि रखता है। प्रभु चाहता है कि प्रत्येक जीवित इकाई हमेशा उसके बारे में सोचे, उसका भक्त बने और हमेशा उसकी पूजा करे। यह स्पष्ट रूप से भगवद-गीता में कहा गया है: मन-मना भव मद-भक्तः। कृष्ण चाहता है कि हर कोई हमेशा उसे याद रखे। सभी को हमेशा कृष्ण को प्रणाम करना चाहिए। यह सर्वोच्च भगवान की इच्छा है, और भक्तों को उनकी इच्छा को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। चूँकि भगवान असीम हैं, इसलिए उनकी इच्छा भी असीमित है। कोई रोक-टोक नहीं है, और इसलिए भक्त की सेवा भी असीमित है। पारलौकिक संसार में प्रभु और सेवक के बीच असीमित प्रतिस्पर्धा होती है। प्रभु अपनी इच्छाओं को असीमित रूप से पूरा करना चाहता है, और भक्त भी अपनी असीमित इच्छाओं को पूरा करने के लिए उसकी सेवा करता है। प्रभु और उनके भक्त के बीच हित की एक असीमित एकता होती है।
