त्वं च सम्यगनुष्ठाय निदेशं म उशत्तम: ।
मयि तीर्थीकृताशेषक्रियार्थो मां प्रपत्स्यसे ॥ ३० ॥
अनुवाद
मेरी आज्ञा का पूर्ण रूप से पालन करके और अपने सभी कर्मों के फल को समर्पित करके तुम अपने हृदय को शुद्ध करोगे और अंततः मुझ तक पहुँचोगे।
By following my instructions well, with a pure heart, you will offer the fruits of all your actions to me and ultimately attain me.
तात्पर्य
यहाँ शब्द तीर्थी-कृताशेष-क्रियार्थः बहुत महत्वपूर्ण हैं। तीर्थ का अर्थ होता है पावन स्थान जहाँ दान दिया जाता है। लोग तीर्थयात्राओं पर जाकर दान-दक्षिणा देते थे। यह प्रथा आज भी प्रचलित है। इसलिए भगवान ने कहा, ''तुम्हारे कर्म और उनके फल को पवित्र करने के लिए तुम सब कुछ मुझे अर्पित करोगे।'' भगवद-गीता में भी इसकी पुष्टि होती है: ''तुम जो भी करो, जो खाओ, जो बलिदान दो, उसका फल मुझे ही अर्पित करो।'' भगवद-गीता में एक और जगह भगवान ने कहा, ''मैं सभी बलिदानों, तपस्याओं और मानवता या समाज कल्याण के लिए किए गए सभी कार्यों का उपभोक्ता हूँ।'' इसलिए सभी कार्य, चाहे वे परिवार कल्याण के लिए, समाज कल्याण के लिए, देश कल्याण के लिए या सम्पूर्ण मानवता कल्याण के लिए हों, कृष्ण चेतना में ही किए जाने चाहिए। कार्दम मुनि को भगवान ने यही शिक्षा दी थी। महाराज युधिष्ठिर ने नारद मुनि का स्वागत करते हुए कहा: ''आप जहाँ भी विराजमान होते हैं, वह स्थान पवित्र हो जाता है क्योंकि भगवान स्वयं आपके हृदय में विराजमान होते हैं।'' इसी प्रकार, यदि हम भगवान और उनके प्रतिनिधि के निर्देशन में कृष्ण चेतना में कार्य करते हैं, तो सब कुछ पवित्र हो जाता है। यही संकेत कार्दम मुनि को दिया गया था, जिन्होंने इस पर अमल किया और इसलिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पत्नी और संतान प्राप्त हुई, जैसा कि बाद के छंदों में वर्णित किया जाएगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥