एक: स्वयं सञ्जगत: सिसृक्षया-
द्वितीययात्मन्नधियोगमायया ।
सृजस्यद: पासि पुनर्ग्रसिष्यसे
यथोर्णनाभिर्भगवन् स्वशक्तिभि: ॥ १९ ॥
अनुवाद
हे मेरे प्रभु, आप अकेले ही ब्रह्माण्डों का निर्माण करते हैं। हे ईश्वर, इन ब्रह्माण्डों को बनाने की इच्छा से आप उनकी रचना करते हैं, उनका पालन-पोषण करते हैं और फिर अपनी शक्तियों से उनका अंत कर देते हैं। ये शक्तियां आपकी दूसरी शक्ति, योगमाया के नियंत्रण में हैं। जिस प्रकार एक मकड़ी अपनी शक्ति से जाल बुनती है और फिर उसे वापस निगल लेती है।
O Lord, You alone create the universes. O Lord, by desiring to create these universes, You create them, maintain them and then destroy them by Your energies. These energies are under Your second power, Yogamaya, just as a spider spins a web by its energies and swallows it again.
तात्पर्य
इस श्लोक में दो महत्वपूर्ण शब्द निर्वैयक्तिक सिद्धांत को खंडित करते हैं कि सब कुछ ईश्वर है। यहाँ कर्दम कहते हैं, "हे भगवान, आप अकेले हैं, लेकिन आपकी विभिन्न ऊर्जाएँ हैं।" मकड़ी का उदाहरण भी बहुत सार्थक है। मकड़ी एक व्यक्तिगत सजीव इकाई है, और अपनी ऊर्जा से यह एक कोबरा बनाती है और उस पर खेलती है, और जब भी उसे पसंद आता है तो वह कोबरे को नष्ट कर देती है, इस प्रकार खेल को समाप्त करती है। जब कोबरा मकड़ी की लार से बनता है, तो मकड़ी अवैयक्तिक नहीं हो जाती। इसी तरह, भौतिक या आध्यात्मिक ऊर्जा के निर्माण और प्रकटीकरण से निर्माता अवैयक्तिक नहीं बनता है। यहाँ बहुत ही प्रार्थना बताती है कि ईश्वर चेतन है और प्रार्थनाओं को सुन सकता है और भक्त की इच्छाओं को पूरा कर सकता है। इसलिए, वह सच्चिदानंद-विग्रह हैं, आनंद, ज्ञान और अनंत काल का रूप।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥