एक प्रश्न उठाया जा सकता है: चूँकि कर्दम मुनि आध्यात्मिक जीवन में उन्नत थे, तो फिर उन्होंने भगवान से मुक्ति क्यों नहीं माँगी? भगवान को व्यक्तिगत रूप से देखने और अनुभव करने के बाद भी वह भौतिक जीवन का आनंद क्यों लेना चाहते थे? उत्तर यह है कि हर कोई भौतिक बंधन से मुक्त होने के योग्य नहीं है। इसलिए हर किसी का कर्तव्य है कि वह अपनी वर्तमान स्थिति के अनुसार भगवान या वेदों के निर्देशन में आनंद उठाए। वेदों को भगवान के प्रत्यक्ष शब्द माना जाता है। प्रभु हमें भौतिक जीवन का आनंद लेने का अवसर देते हैं जैसा हम चाहते हैं, और साथ ही वह वेदों का पालन करने के तरीकों और प्रक्रियाओं के लिए निर्देश भी देते हैं ताकि धीरे-धीरे व्यक्ति भौतिक बंधन से मुक्ति प्राप्त कर सके। जो सशर्त आत्माएँ भौतिक प्रकृति पर शासन करने की अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए भौतिक जगत में आई हैं, वे प्रकृति के नियमों से बंधी हैं। सबसे अच्छा उपाय है वैदिक नियमों का पालन करना; जो कि व्यक्ति को धीरे-धीरे मुक्ति की ओर ऊँचा उठाने में मदद करेगा।
कर्दम मुनि भगवान को शुक कहते हैं, जिसका अर्थ है "धर्म का नेता"। जो धार्मिक है उसे धर्म के नियमों का पालन करना चाहिए, क्योंकि ऐसे नियम स्वयं भगवान द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। कोई भी धर्म का निर्माण या निर्माण नहीं कर सकता; "धर्म" का तात्पर्य भगवान के आदेशों या कानूनों से है। भगवद-गीता में भगवान कहते हैं कि धर्म का अर्थ है उनको समर्पण करना। इसलिए व्यक्ति को वैदिक विनियमों का पालन करना चाहिए और परमेश्वर के समक्ष समर्पण करना चाहिए क्योंकि यही मानव जीवन में पूर्णता का अंतिम लक्ष्य है। व्यक्ति को पवित्र जीवन जीना चाहिए, धार्मिक नियमों और विनियमों का पालन करना चाहिए, विवाह करना चाहिए और आध्यात्मिक अनुभूति की उच्च स्थिति की प्राप्ति के लिए शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहिए।
