ये मायया ते हतमेधसस्त्वत्-
पादारविन्दं भवसिन्धुपोतम् ।
उपासते कामलवाय तेषां
रासीश कामान्निरयेऽपि ये स्यु: ॥ १४ ॥
अनुवाद
आपके श्री चरण सांसारिक अज्ञानता के सागर को पार करने की सच्ची नाव हैं। केवल वही लोग, जिन्होंने भ्रामक ऊर्जा के प्रभाव में अपनी बुद्धि खो दी है, वे क्षणिक इंद्रिय सुखों को प्राप्त करने के लिए आपके चरणों की पूजा करेंगे, जिन्हें नरक में जलने वाले लोग भी प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन, हे प्रभु, आप इतने दयालु हैं कि आप उन पर भी कृपा करते हैं।
Your lotus feet are like a true boat to cross the ocean of material ignorance. Only ignorant men under the influence of Maya worship these feet for the sake of obtaining petty and momentary pleasures of the senses, which even a person rotting in hell can obtain. Still, O Lord, You are so merciful that You bestow Your grace even on them.
तात्पर्य
जैसा कि भगवद्-गीता, सातवें अध्याय में बताया गया है, भक्त दो प्रकार के होते हैं - वे जो भौतिक सुख चाहते हैं और वे जो प्रभु की सेवा के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहते हैं। भौतिक सुख सूअर और कुत्तों द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है, जिनकी जीवन स्थिति नारकीय है। सूअर भी खाता है, सोता है और यौन जीवन का पूरा आनंद लेता है, और वह भौतिक अस्तित्व के ऐसे नारकीय आनंद से भी बहुत संतुष्ट होता है। आधुनिक योगी सलाह देते हैं कि क्योंकि लोगों के पास इंद्रियाँ हैं, इसलिए उन्हें बिल्लियों और कुत्तों की तरह पर्याप्त आनंद लेना चाहिए, फिर भी वे योग का अभ्यास जारी रख सकते हैं। यहाँ कर्दम मुनि द्वारा इसकी निंदा की जाती है; वे कहते हैं कि इस प्रकार के भौतिक सुख नारकीय स्थिति में बिल्लियों और कुत्तों के लिए उपलब्ध हैं। भगवान इतने दयालु हैं कि यदि तथाकथित योगी नारकीय सुखों से संतुष्ट हैं, तो वे उन्हें उनकी इच्छा के सभी भौतिक सुख प्राप्त करने की सुविधा दे सकते हैं, लेकिन वे कर्दम मुनि द्वारा प्राप्त पूर्णता के चरण को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। नारकीय और राक्षसी व्यक्ति वास्तव में नहीं जानते कि पूर्णता में अंतिम उपलब्धि क्या है, और इसलिए वे सोचते हैं कि इंद्रिय संतुष्टि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। वे सलाह देते हैं कि व्यक्ति इंद्रियों को संतुष्ट कर सकता है और साथ ही, किसी मंत्र का पाठ करके और कुछ अभ्यास द्वारा सस्ते में पूर्णता की आकांक्षा कर सकता है। ऐसे व्यक्तियों को यहां हत-मेधसः के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है "जिनके दिमाग खराब हो गए हैं।" वे योग या ध्यान की पूर्णता से भौतिक आनंद की आकांक्षा करते हैं। भगवद्-गीता में भगवान ने कहा है कि देवताओं की पूजा करने वालों की बुद्धि खराब हो गई है। इसी तरह, यहाँ भी कर्दम मुनि ने कहा है कि जो व्यक्ति योग के अभ्यास से भौतिक आनंद की आकांक्षा करता है, उसने अपने मस्तिष्क के पदार्थ को खराब कर लिया है और वह मूर्ख नंबर एक है। वास्तव में, योग के बुद्धिमान अभ्यासी को भगवान के व्यक्तित्व की पूजा करके अज्ञानता के सागर को पार करने और भगवान के चरण कमलों को देखने के अलावा और कुछ नहीं करना चाहिए। हालाँकि, भगवान इतने दयालु हैं कि आज भी जिन व्यक्तियों का मस्तिष्क पदार्थ खराब हो गया है, उन्हें बिल्लियाँ, कुत्ते या सूअर बनने और यौन जीवन और इंद्रिय संतुष्टि से भौतिक सुख प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया जाता है। भगवान ने भगवद्-गीता में इस आशीर्वाद की पुष्टि की है: "व्यक्ति मुझसे जो कुछ भी प्राप्त करना चाहता है, मैं उसे उसकी इच्छानुसार प्रदान करता हूँ।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥