कर्दम ऋषि ने कहा—हे अति पूजनीय प्रभु, आप जो सम्पूर्ण अस्तित्वों के भण्डार हैं, मैं आपका साक्षात्कार पाकर अपने दृष्टि-यज्ञ को पूर्णता तक पहुँचा सका हूँ। महान् योगीजन जन्मों-जन्मों तक गहन ध्यान के द्वारा आपके दिव्य स्वरूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं।
Kardama Muni said, "O Supremely Revered Lord, my desire to see you, the repository of all existence, has been fulfilled. Great Yogis take birth again and again and keep wishing to see your divine form in deep meditation.
तात्पर्य
भगवद व्यक्तित्व के बारे में यहाँ यह कहा गया है कि वह सभी अच्छाइयों और सुखों के भंडार है। हम जब तक अच्छाई के स्वरूप में स्थिर नहीं होते, हमें वास्तविक सुख की प्राप्ति नहीं होती। इसलिए जब हमारा शरीर, मन, कर्म सब भगवान की सेवा में लग जाते हैं, तब हम अच्छाई की सर्वोच्च सिद्धावस्था में पहुँच जाते हैं। कर्दम मुनि कहते हैं, "हे प्रभु, आप सभी भलाई के नाम से जानी जाने वाली चीजों के भंडार हैं और हमें आपका साक्षात दर्शन हो गया, अब हमारे देखने की क्षमता परिपूर्ण हो गई है।" ये उक्तियाँ विशुद्ध भक्तिपरक स्थितियाँ हैं, एक भक्त के लिए, उसकी इंद्रियों की सिद्धि भगवान की सेवा में समर्पित हो जाना ही है। भगवान के सौंदर्य को देखते रहने में हमारी दृष्टि की इंद्रिय परिपूर्ण हो जाती है, भगवान की कीर्ति सुनते रहने से सुनने की शक्ति परिपूर्ण हो जाती है, प्रसाद खाने से भोजन का आनंद लेने की शक्ति परिपूर्ण हो जाती है। जब सारी इंद्रियाँ भगवद व्यक्तित्व के साथ संबंध स्थापित करती हैं, तब हमारी सिद्धावस्था को तकनीकी रूप से भक्ति-योग कहते हैं, जिसमें हम अपनी इंद्रियों को भौतिक लिप्साओं से अलग करके उन्हें भगवान की सेवा से जोड़ते हैं। जब कोई व्यक्ति सभी नियुक्त सशर्त जीवन से मुक्त हो जाता है और पूर्ण रूप से भगवान की सेवा में लग जाता है, तब उसकी उस सेवा को भक्ति-योग कहते हैं। कर्दम मुनि स्वीकार करते हैं कि भक्ति-योग मार्ग से भगवान को व्यक्तिगत रूप से देखना ही दृष्टि की परिपूर्णता है। कर्दम मुनि भगवान को देखने की महान परिपूर्णता को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बता रहे। वह प्रमाण देते हैं कि जो लोग योग में वास्तव में ऊपर उठे हैं, वे जन्म-जन्मांतर भगवद व्यक्तित्व के इस रूप को देखने के लिए तरसते रहते हैं। वह कोई काल्पनिक योगी नहीं था। जो लोग वास्तव में उन्नत पथ पर हैं, वे केवल भगवान के शाश्वत रूप को देखने के लिए ही तरसते रहते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥