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श्लोक 3.21.13  |
ऋषिरुवाच
जुष्टं बताद्याखिलसत्त्वराशे:
सांसिद्ध्यमक्ष्णोस्तव दर्शनान्न: ।
यद्दर्शनं जन्मभिरीड्य सद्भि-
राशासते योगिनो रूढयोगा: ॥ १३ ॥ |
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| अनुवाद |
| कर्दम ऋषि ने कहा—हे अति पूजनीय प्रभु, आप जो सम्पूर्ण अस्तित्वों के भण्डार हैं, मैं आपका साक्षात्कार पाकर अपने दृष्टि-यज्ञ को पूर्णता तक पहुँचा सका हूँ। महान् योगीजन जन्मों-जन्मों तक गहन ध्यान के द्वारा आपके दिव्य स्वरूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं। |
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| कर्दम ऋषि ने कहा—हे अति पूजनीय प्रभु, आप जो सम्पूर्ण अस्तित्वों के भण्डार हैं, मैं आपका साक्षात्कार पाकर अपने दृष्टि-यज्ञ को पूर्णता तक पहुँचा सका हूँ। महान् योगीजन जन्मों-जन्मों तक गहन ध्यान के द्वारा आपके दिव्य स्वरूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं। |
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