विन्यस्तचरणाम्भोजमंसदेशे गरुत्मत: ।
दृष्ट्वा खेऽवस्थितं वक्ष:श्रियं कौस्तुभकन्धरम् ॥ ११ ॥
अनुवाद
अपने वक्ष पर सुनहरी रेखा और अपने गले में प्रसिद्ध कौस्तुभ मणि लटका कर, वे गरुड़ के कंधों पर अपने कमल के समान चरण रख कर आकाश में खड़े थे।
Wearing a golden line on His chest and the famous Kaustubhamani hanging around His neck, He stood in the sky (air) with His lotus feet on the shoulders of Garuda.
तात्पर्य
श्रीमदभगवद् गीता के श्लोक 9-11 में भगवान के उन लोकिक नित्य-स्वरूपों का वर्णन है जिनका बोध हम सर्वोच्च प्रमाणभूत वेद से ही कर सकते हैं। यह निश्चित ही कार्दम मुनि की अपनी कल्पना नहीं है। भगवान की सजावट भौतिक अवधारणा से परे है, जैसा कि स्वयं शंकराचार्य जैसे निराकारवादियों ने भी स्वीकार किया है: नारायण, भगवान का परम व्यक्तित्व, भौतिक सृष्टि से कुछ भी लेना-देना नहीं है। श्रीमद् भगवान् की अनेकता - उनका शरीर, उनका स्वरूप, उनका वेष, उनका उपदेश, उनके वाणी - भौतिक ऊर्जा द्वारा निर्मित नहीं हैं, किन्तु ये सब वैदिक साहित्य में प्रमाणित हैं। योग के अभ्यास द्वारा कार्दम मुनि ने वास्तव में परम भगवान को देखा था जैसा कि वे हैं। योग का अभ्यास करने के बाद दस हज़ार वर्षों तक ईश्वर के किसी काल्पनिक रूप को देखने का कोई औचित्य नहीं था। अतः, योग की पूर्णता पूर्ण शून्यता या निराकारवाद में समाप्त नहीं होती है; इसके विपरीत, योग की पूर्णता तब प्राप्त होती है जब व्यक्ति वास्तव में भगवान के व्यक्तित्व को उनके नित्य-स्वरूप में देख लेता है। कृष्ण भावनाभावना का प्रक्रिया कृष्ण के रूप को सीधे वितरित करना है। कृष्ण के रूप का वर्णन सर्वोच्च प्रमाणभूत वैदिक साहित्य ब्रह्म-संहिता में किया गया है: उनका निवास चिंतामणि पत्थर से बना है, और भगवान वहाँ एक ग्वाले लड़के के रूप में खेलते हैं और उनकी सेवा हजारों गोपियाँ करती हैं। यह वर्णन प्रमाणिक है, और एक कृष्ण भावनाभावनायुक्त व्यक्ति सीधे इसे लेता है, इस पर अमल करता है, इसका उपदेश देता है और प्रमाणिक शास्त्रों में निषेध की गई भक्ति सेवा का अभ्यास करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥