श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  3.20.53 
तेभ्यश्चैकैकश: स्वस्य देहस्यांशमदादज: ।
यत्तत्समाधियोगर्द्धितपोविद्याविरक्तिमत् ॥ ५३ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माण्ड के अजन्मे सृष्टिकर्ता (ब्रह्मा) ने इन पुत्रों में से प्रत्येक को अपने शरीर का एक-एक अंग दिया, जो गहन चिंतन, मानसिक एकाग्रता, अलौकिक शक्ति, तपस्या, पूजा और त्याग के गुणों से युक्त था।
 
The unborn creator of the universe (Brahma) gave each of these sons a part of His body which was endowed with the characteristics of deep contemplation, mental concentration, natural strength, austerity, worship and renunciation.
तात्पर्य
इस पद में विरक्तिमत शब्द का अर्थ है "त्याग के गुणों से संपन्न।" भौतिकवादी व्यक्ति आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। जो व्यक्ति इंद्रिय-सुख के आदी होते हैं, उनके लिए आध्यात्मिक अनुभूति संभव नहीं है। भगवद्-गीता में कहा गया है कि जो लोग भौतिक संपत्ति और भौतिक सुख की तलाश में बहुत अधिक आसक्त होते हैं, वे योग-समाधि, कृष्ण चेतना में लीनता, तक नहीं पहुँच सकते। यह प्रचार कि कोई इस जीवन का भौतिक रूप से आनंद उठा सकता है और साथ ही साथ आध्यात्मिक रूप से भी उन्नति कर सकता है, बकवास है। त्याग के सिद्धांत चार हैं: (१) अवैध यौन जीवन से बचना, (२) मांसाहार से बचना, (३) नशा से बचना और (४) जुए से बचना। इन चारों सिद्धांतों को तपस्या या तपस्या कहा जाता है। कृष्ण चेतना में मन को सर्वोच्च में लीन करना आध्यात्मिक अनुभूति की प्रक्रिया है।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध तीन के अंतर्गत बीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)