श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.20.44 
सिद्धान् विद्याधरांश्चैव तिरोधानेन सोऽसृजत् ।
तेभ्योऽददात्तमात्मानमन्तर्धानाख्यमद्भुतम् ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
तब दृष्टि से अदृश्य रहने की अपनी क्षमता से भगवान ब्रह्माजी ने सिद्धों और विद्याधरों को अस्तित्व में लाया और उन्हें अपना अद्भुत रूप प्रदान किया जिसे अंतर्धान कहा जाता है।
 
Then, due to his ability to remain invisible, Brahma created Siddhas and Vidyadhars and gave them his strange form called Antardhan.
तात्पर्य
अंतर्धान का मतलब है कि इन जीवों को उपस्थित पाया जा सकता है, पर उन्हें दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)