श्राद्ध वेदों के अनुयायियों द्वारा पालन किए जाने वाले एक कर्मकांडीय अनुष्ठान है। पंद्रह दिनों का एक वार्षिक अवसर होता है जब कर्मकांडी धर्मगुरू दिवंगत आत्माओं को तर्पण करने के सिद्धांत का पालन करते हैं। इस प्रकार, वे पिता और पूर्वज जो प्रकृति की विचित्रताओं के कारण भौतिक भोग के लिए स्थूल शरीर नहीं प्राप्त कर पाए हैं, उन्हें अपने वंशजों द्वारा श्राद्ध तर्पण किए जाने के कारण एक बार फिर ऐसे शरीर प्राप्त कर सकते हैं। श्राद्ध का अनुष्ठान, या प्रसाद के साथ तर्पण करना, आज भी भारत में प्रचलित है, विशेषकर गया में, जहां विष्णु के चरण कमलों पर एक प्रसिद्ध मंदिर में तर्पण अर्पित किए जाते हैं। चूंकि भगवान इस प्रकार वंशजों की भक्ति सेवा से प्रसन्न होते हैं, इसलिए अपनी कृपा से वे उन पूर्वजों की निंदित आत्माओं को मुक्त करते हैं जिनके पास स्थूल शरीर नहीं हैं, और उन्हें आध्यात्मिक उन्नति के विकास के लिए एक बार फिर एक स्थूल शरीर प्राप्त करने का पक्ष लेते हैं।
दुर्भाग्य से, माया के प्रभाव से, बद्ध आत्मा संतुष्टि के लिए प्राप्त शरीर का उपयोग करता है, यह भूल जाता है कि ऐसा व्यवसाय उसे एक अदृश्य शरीर में लौटा सकता है। हालाँकि, भगवान के भक्त, या जो कृष्ण चेतना में हैं, उन्हें श्राद्ध जैसे कर्मकांडीय समारोह करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे हमेशा परम भगवान को प्रसन्न करते हैं; इसलिए उनके पिता और पूर्वज जो कठिनाई में पड़ सकते थे, वे स्वचालित रूप से मुक्त हो जाते हैं। इसका एक ज्वलंत उदाहरण प्रह्लाद महाराज है। प्रह्लाद महाराज ने भगवान नृसिंहदेव से अपने पापी पिता को मुक्त करने का अनुरोध किया, जिन्होंने भगवान के चरण कमलों का कई बार अपमान किया था। भगवान ने उत्तर दिया कि जिस परिवार में प्रह्लाद जैसा वैष्णव जन्म लेता है, न केवल उसका पिता बल्कि उसके पिता के पिता और उनके पिता - चौदहवें पिता तक - सभी स्वतः ही मुक्त हो जाते हैं। इसलिए, निष्कर्ष यह है कि कृष्ण चेतना परिवार के लिए, समाज के लिए और सभी जीवित संस्थाओं के लिए सभी अच्छे कामों का योग है। चैतन्य-चरितामृत में, लेखक कहता है कि कृष्ण चेतना से पूर्ण रूप से परिचित व्यक्ति कोई भी अनुष्ठान नहीं करता है क्योंकि वह जानता है कि पूर्ण कृष्ण चेतना में कृष्ण की सेवा करने से सभी अनुष्ठान स्वतः ही हो जाते हैं।
