श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.20.35 
या वा काचित्त्वमबले दिष्टय‍ा सन्दर्शनं तव ।
उत्सुनोषीक्षमाणानां कन्दुकक्रीडया मन: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
हे रूपवती कन्या, तुम चाहे जो भी हो, हम भाग्यशाली हैं कि हम तुम्हें देख पा रहे हैं। अपने गेंद के खेल से तुमने हम दर्शकों के चित्त को विचलित कर दिया है।
 
O beautiful girl, whoever you are, we are fortunate to see you. You have distracted us spectators with your ball play.
तात्पर्य
सुंदर स्त्रियों के चमकीले सौंदर्य को देखने के लिए राक्षस कई तरह के प्रदर्शन का इंतजाम करते हैं। यहाँ कहा गया है कि उन्होंने लड़की को गेंद के साथ खेलते हुए देखा। कभी-कभी राक्षसी विपरीत लिंग के साथ टेनिस जैसे तथाकथित खेलों का आयोजन करते हैं। इस तरह के खेल का उद्देश्य सुंदर लड़की के शारीरिक बनावट को देखना और एक सूक्ष्म यौन मानसिकता का आनंद लेना है। भौतिक आनंद की यह राक्षसी यौन मानसिकता को कभी-कभी तथाकथित योगियों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है जो जनता को विभिन्न किस्मों यौन जीवन का आनंद लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उसी समय विज्ञापन देते हैं कि यदि कोई एक निश्चित निर्मित मंत्र पर ध्यान करता है तो वह छह महीने के भीतर भगवान बन सकता है। जनता को धोखा दिया जाना पसंद है और इसलिए कृष्ण ऐसे धोखेबाज को बनाते हैं जो गलत तरीके से पेश करते हैं और भ्रमित करते हैं। ये तथाकथित योगी वास्तव में योगियों की पोशाक में दुनिया के आनंद लेने वाले हैं। हालाँकि, भगवद-गीता यह अनुशंसा करती है कि यदि कोई जीवन का आनंद लेना चाहता है, तो यह इन्हीं स्थूल इंद्रियों के साथ नहीं हो सकता। अनुभवी चिकित्सक रोगी को रोगग्रस्त स्थिति में साधारण आनंद से बचना की सलाह देता है। एक रोगग्रस्त व्यक्ति किसी भी चीज का आनंद नहीं उठा सकता; रोग से छुटकारा पाने के लिए उसे अपने आनंद को संयमित करना होगा। इसी तरह, हमारी भौतिक स्थिति एक रोगग्रस्त स्थिति है। यदि कोई वास्तविक इंद्रिय आनंद का आनंद लेना चाहता है, तो उसे भौतिक अस्तित्व की उलझन से मुक्त होना चाहिए। आध्यात्मिक जीवन में हम इंद्रिय भोग का आनंद ले सकते हैं जिसका कोई अंत नहीं है। भौतिक और आध्यात्मिक आनंद के बीच का अंतर यह है कि भौतिक आनंद सीमित है। भले ही कोई व्यक्ति भौतिक यौन भोग में संलग्न हो, वह लंबे समय तक इसका आनंद नहीं उठा सकता। लेकिन जब यौन भोग छोड़ दिया जाता है, तो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कर सकता है, जो कभी न खत्म होने वाला है। भागवतम (5.5.1) में कहा गया है कि ब्रह्म-सुख, आध्यात्मिक सुख, अनंत है, अविरल है। मूर्ख प्राणी पदार्थ की सुंदरता के प्रति आसक्त होते हैं और सोचते हैं कि यह जो आनंद प्रदान करता है वह वास्तविक है, लेकिन वास्तव में वह वास्तविक आनंद नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)