तां क्वणच्चरणाम्भोजां मदविह्वललोचनाम् ।
काञ्चीकलापविलसद्दुकूलच्छन्नरोधसम् ॥ २९ ॥
अनुवाद
ब्रह्मा के त्यागे हुए देह ने सन्ध्या का रूप ले लिया, जो कि दिन और रात के मिलन का समय है और काम भाव जगाती है। असुर, जो स्वाभाविक रूप से कामुक होते हैं और रजोगुण से भरे होते हैं, उसे एक सुन्दरी समझ बैठे जिसके चरण-कमलों से नूपुरों की ध्वनि निकल रही थी, जिसके नेत्र मद से विस्तीर्ण थे और जिसका कटि भाग महीन वस्त्र से ढका था जिस पर कमरबंद चमक रही थी।
The body abandoned by Brahma assumed the form of Sandhya (evening), the time between day and night which arouses passion. The demons, who are lustful by nature and in whom the Rajoguna is predominant, considered her to be a beautiful lady whose anklets were making sound from her lotus feet, whose eyes were wide with intoxication, whose waist was covered with a fine cloth and on whom the girdle was shining.
तात्पर्य
जैसे सुबह का प्रारंभिक समय अध्यात्मिक विकास का समय होता है, वैसे ही शाम का प्रारंभ समय कामोन्माद का होता है। आसुरी प्रवृत्ति के लोग सामान्य रूप से काम-सुख का भरपूर आनंद उठाना पसंद करते हैं; इसलिये वे शाम के आगमन की बहुत अधिक सराहना करते हैं। आसुरी प्रवृत्ति के लोगों ने शाम के समय आते हुए अंधेरे को एक सुंदर महिला के रूप में देखा और वे उसे विविध तरीकों से पूजने लगे। उन्होंने कल्पना की कि शाम का समय एक बहुत ही सुंदर महिला है जिसके पैरों में घुंघरू बंधे हैं, कमर पर करधनी है और स्तन सुंदर हैं और अपनी कामुक संतुष्टि के लिये उन्होंने उस सुंदर लड़की को अपने सामने प्रकट होते हुए कल्पना किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥