श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.20.28 
सोऽवधार्यास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शन: ।
विमुञ्चात्मतनुं घोरामित्युक्तो विमुमोच ह ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
दूसरों के मन को स्पष्ट देख सकने वाले भगवान ने ब्रह्मा जी की व्यथा को समझ लिया और उनसे कहा, "तुम अपने इस अपवित्र शरीर को त्याग दो।" भगवान के आदेश से ब्रह्मा जी ने अपना शरीर त्याग दिया।
 
The Lord, who can clearly see the minds of all, understood Brahmā's pain and said to him, "Give up this impure body of yours." Upon receiving the command from the Lord, Brahmā gave up his body.
तात्पर्य
यहाँ प्रभु को विविक्ताध्यात्म-दर्शनः शब्द से वर्णित किया गया है। यदि कोई दूसरे की पीड़ा को पूर्ण रूप से, बिना किसी संदेह के समझ लेता है, तो वह स्वयं प्रभु है। यदि कोई पीड़ा में है और अपने मित्र से राहत पाना चाहता है, तो कभी-कभी ऐसा होता है कि उसका मित्र उसकी पीड़ा की गहनता का एहसास नहीं कर पाता। लेकिन परम प्रभु के लिए यह कठिन नहीं है। परम प्रभु, परमात्मा के रूप में, हर जीवित इकाई के हृदय में विराजमान हैं, और वह पीड़ा के सटीक कारणों को सीधे ही समझ लेते हैं। भगवद गीता में प्रभु कहते हैं, सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः: "मैं हर किसी के दिल में विराजमान हूं, और मेरे कारण ही तुम्हें याद रहता है और भूल जाते हो।" इस प्रकार जब भी कोई पूर्ण रूप से परम प्रभु के समक्ष समर्पण करता है, तो वह पाता है कि वह उसके हृदय में विराजमान है। वह हमें निर्देश दे सकते हैं कि कैसे खतरों से बाहर निकलें या कैसे भक्तिपूर्ण सेवा में उनसे संपर्क करें। हालाँकि, प्रभु ने ब्रह्मा से अपने वर्तमान शरीर को त्यागने के लिए कहा क्योंकि इससे एक राक्षसी प्रकृति का निर्माण हुआ था। श्रीधर स्वामी के अनुसार, ब्रह्मा का लगातार अपने शरीर को त्यागने का तात्पर्य वास्तव में उनके शरीर को त्यागने से नहीं है। बल्कि, उनका सुझाव है कि ब्रह्मा ने एक खास मानसिकता को त्याग दिया। मन जीवित इकाई का सूक्ष्म शरीर है। कभी-कभी हम किसी पापमय विचार में लीन हो सकते हैं, लेकिन यदि हम पापमय विचार को त्याग देते हैं, तो यह कहा जा सकता है कि हम शरीर को त्याग देते हैं। राक्षसों का निर्माण करने के समय ब्रह्मा का दिमाग सही नहीं था। उस समय वह पूर्ण रूप से अभिलाषापूर्ण होगा क्योंकि पूरा निर्माण ही अभिलाषापूर्ण था। इसलिए, ऐसे ही अभिलाषापूर्ण पुत्र पैदा हुए। इससे यह पता चलता है कि माता-पिता को बच्चे पैदा करते समय भी सावधानी बरतनी चाहिए। माता-पिता की मानसिक स्थिति पर ही बच्चे की मानसिक स्थिति उसके जन्म के समय निर्भर करती है। इसलिए, वैदिक प्रणाली के अनुसार, गभ्राधान संस्कार, या बच्चे को जन्म देने का समारोह माना जाता है। बच्चे को जन्म देने से पहले, व्यक्ति को अपने मिश्रित दिमाग को पवित्र करना होगा। माता-पिता जब अपने दिमाग को प्रभु के चरण कमलों में लगाते हैं और ऐसी स्थिति में बच्चे का जन्म होता है, तो स्वाभाविक ही अच्छे भक्त बच्चे पैदा होते हैं। जब समाज इस तरह की अच्छी आबादी से भरा होता है, तो राक्षसी मानसिकता से कोई परेशानी नहीं होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)