श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.20.27 
त्वमेक: किल लोकानां क्लिष्टानां क्लेशनाशन: ।
त्वमेक: क्लेशदस्तेषामनासन्नपदां तव ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, दुखियों के कष्टों को दूर करने और आपके चरणों की शरण में न आने वालों को यातना देने की शक्ति सिर्फ आपमें ही है।
 
O Lord, You alone are capable of relieving the sufferings of the distressed and tormenting those who do not seek refuge at Your feet.
तात्पर्य
शब्द क्लेशदाः तेषामनासन्न-पदाँ तव इस ओर इशारा करते हैं कि प्रभु की दो चिंताएं हैं। पहली है अपने चरण-कमलों का आश्रय लेने वालों की सुरक्षा, और दूसरी उन लोगों को परेशानी देना जो हमेशा आसुरी प्रवृत्ति के होते हैं और प्रभु के प्रति शत्रुता रखते हैं। माया का कार्य भक्तों को क्लेश देना है। यहाँ ब्रह्मा ने कहा, "आप समर्पण करने वाली आत्माओं के रक्षक हैं; इसलिए मैं आपके चरण-कमलों में आत्मसमर्पण करता हूँ। कृपया मुझे इन राक्षसों से सुरक्षा प्रदान करें।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)