शौनक ऋषि ने विदुर के बारे में पूछा, जो भगवान श्री कृष्ण के बहुत बड़े भक्त और उनका साथी था तथा जिसने अपने बड़े भाई का साथ केवल इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उसने अपने पुत्रों के साथ मिलकर भगवान की इच्छा के अनुसार कार्य करने से मना कर दिया था।
Sage Shaunaka wanted to know about Vidur, who was a great devotee and friend of Lord Krishna and who, for the sake of the Lord, had abandoned his elder brother who, along with his sons, had conspired against the will of the Lord.
तात्पर्य
यहाँ जिस घटना की ओर इशारा किया गया है, वह यह है कि विदुर अपने महाबड़े भाई धृतराष्ट्र के संरक्षण को त्याग कर, सभी तीर्थस्थलों की यात्रा करते हुए हरिद्वार में मैत्रेय से मिले। शौनक ऋषि यहाँ मैत्रेय ऋषि और विदुर के बीच बातचीत के विषयों के बारे में जानकारी लेते हैं। विदुर की खूबी यह थी कि वह न केवल भगवान के मित्र थे, बल्कि एक महान भक्त भी थे। जब कृष्ण ने युद्ध को रोकने और चचेरे भाइयों के बीच की गलतफहमी को दूर करने का प्रयास किया, तो उन्होंने उनकी सलाह को स्वीकार करने से इंकार कर दिया; इसलिए क्षत्ता या विदुर उनसे नाखुश थे, और उन्होंने महल छोड़ दिया था। एक भक्त के रूप में, विदुर ने उदाहरण देकर दिखाया कि जहाँ भी कृष्ण का सम्मान नहीं किया जाता, वह मनुष्य के रहने के लिए अयोग्य है। एक भक्त अपने स्वयं के हितों के बारे में सहिष्णु हो सकता है, लेकिन जब भगवान या भगवान के भक्त के प्रति दुर्व्यवहार होता है, तो उसे सहिष्णु नहीं होना चाहिए। यहाँ अघवान शब्द बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बताता है कि कौरव, धृतराष्ट्र के पुत्र, कृष्ण के निर्देशों की अवहेलना करने के कारण युद्ध हार गए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥