अंध-तामिस्र में मृत्यु को अंतिम अंत मानना शामिल है। नास्तिक आमतौर पर सोचते हैं कि शरीर ही आत्मा है और इसलिए शरीर के समाप्त होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है। इस प्रकार वे शरीर के अस्तित्व के दौरान जहाँ तक संभव हो भौतिक जीवन का आनंद लेना चाहते हैं। उनका सिद्धांत है: "जब तक आप जीवित रहें, तब तक आपको समृद्ध रूप से जीना चाहिए। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप सभी प्रकार के तथाकथित पाप करते हैं। आपको खूब खाना चाहिए। भीख मांगो, उधार लो और चोरी करो, और अगर आपको लगता है कि चोरी करने और उधार लेने से आप पापपूर्ण गतिविधियों में उलझ रहे हैं जिसके लिए आपको भुगतान करना होगा, तो बस उस गलतफहमी को भूल जाइए क्योंकि मृत्यु के बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है। अपने जीवन के दौरान वह जो कुछ भी करता है उसके लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं होता है।" जीवन की यह नास्तिक अवधारणा मानवीय सभ्यता को मार रही है, क्योंकि यह शाश्वत जीवन की निरंतरता के ज्ञान के बिना है।
यह अंध-तामिस्र अज्ञान तमस के कारण है। आत्मा के बारे में कुछ भी नहीं जानने की स्थिति को तमस कहते हैं। इस भौतिक जगत को भी सामान्यतः तमस कहा जाता है क्योंकि इसके निन्यानबे प्रतिशत जीव आत्मा के रूप में अपनी पहचान से अनभिज्ञ हैं। लगभग हर कोई सोच रहा है कि वह यह शरीर है; उसे आत्मा के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इस भ्रांति से निर्देशित होकर, व्यक्ति हमेशा सोचता है, "यह मेरा शरीर है, और इस शरीर के साथ संबंध में कुछ भी मेरा है।" ऐसी गुमराह जीवों के लिए, कामुक जीवन भौतिक अस्तित्व की पृष्ठभूमि है। दरअसल, इस भौतिक संसार में अज्ञान में बंधी आत्माएं केवल कामुक जीवन द्वारा निर्देशित होती हैं, और जैसे ही उन्हें कामुक जीवन का अवसर मिलता है, वे तथाकथित घर, मातृभूमि, बच्चे, धन और ऐश्वर्य से जुड़ जाते हैं। जैसे-जैसे ये आसक्तियाँ बढ़ती जाती हैं, मोह या शारीरिक अवधारणा के भ्रम का जीवन भी बढ़ता जाता है। इस प्रकार यह विचार कि "मैं यह शरीर हूँ, और इस शरीर से संबंधित सब कुछ मेरा है" भी बढ़ता जाता है, और जैसे ही पूरी दुनिया को मोह में डाला जाता है, सांप्रदायिक समाज, परिवार और राष्ट्रीयताएँ निर्मित होती हैं, और वे एक दूसरे के साथ लड़ते हैं। महा-मोह का अर्थ है भौतिक सुख के पीछे पागल होना। विशेष रूप से कलियुग में, हर कोई भौतिक सुख के लिए सामान जमा करने की दीवानगी से अभिभूत है। विष्णु पुराण में इन परिभाषाओं को बहुत अच्छी तरह से दिया गया है, जिसमें कहा गया है:
तमो विवेको मोहः स्यात्
अंतःकरण-विभ्रमः
महा-मोहस्तु विज्ञेयो
ग्राम्य-भोग-सुखैषणा
मरनम् ह्यंध-तामिस्रम्
तामिस्रम् क्रोध उच्यते
अविद्या पंच-पर्वेषा
प्रादुर्भूता महत्मनः
