श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 20: मैत्रेय-विदुर संवाद  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.20.18 
ससर्ज च्छाययाविद्यां पञ्चपर्वाणमग्रत: ।
तामिस्रमन्धतामिस्रं तमो मोहो महातम: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
सबसे पहले, ब्रह्मा ने अपनी छाया से बंधे हुए जीवों के अज्ञानता के आवरणों (कोश) को बनाया। ये पाँच हैं और उन्हें तामिस्र, अंध-तामिस्र, तमस, मोह और महामोह कहा जाता है।
 
Brahma first created from his shadow the veils (sheaths) of ignorance of the conditioned souls. Their number is five and they are called Tamisra, Andha-Tamisra, Tamas, Moha and Mahamoha.
तात्पर्य
शर्तबद्ध आत्माएँ या जीव जो संवेदनात्मक संतुष्टि का आनंद लेने के लिए भौतिक दुनिया में आते हैं, शुरुआत में पाँच भिन्न स्थितियों से आच्छादित होते हैं। पहली स्थिति तामिस्र या क्रोध का आवरण है। मूल रूप से, प्रत्येक जीव की एक नगण्य स्वतंत्रता होती है; शर्तबद्ध आत्मा के लिए उस नगण्य स्वतंत्रता का दुरुपयोग करना है यह सोचना कि वह भी परम भगवान की तरह आनंद ले सकता है या सोचना, "मैं जैसे सर्वोच्च भगवान की तरह एक स्वतंत्र आनंददायक व्यक्ति क्यों नहीं हो सकता?" अपनी संवैधानिक स्थिति को भूलना क्रोध या ईर्ष्या के कारण है। जीव, सनातन रूप से परमेश्वर का एक अंग-और-पार्सल सेवक होने के नाते, संविधान द्वारा, कभी भी प्रभु के साथ एक समान आनंद लेने वाला नहीं हो सकता। हालाँकि, जब वह इसे भूल जाता है, और उसके समान बनने की कोशिश करता है, तो उसकी स्थिति को तामिस्र कहा जाता है। आध्यात्मिक अनुभूति के क्षेत्र में भी, जीव की इस तामिस्र मानसिकता पर विजय पाना कठिन है। भौतिक जीवन की उलझन से बाहर निकलने की कोशिश में, कई ऐसे हैं जो सर्वोच्च के साथ एक होना चाहते हैं। उनकी पारलौकिक गतिविधियों में भी, तामिस्र की यह निम्न-श्रेणी मानसिकता जारी रहती है।

अंध-तामिस्र में मृत्यु को अंतिम अंत मानना शामिल है। नास्तिक आमतौर पर सोचते हैं कि शरीर ही आत्मा है और इसलिए शरीर के समाप्त होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है। इस प्रकार वे शरीर के अस्तित्व के दौरान जहाँ तक संभव हो भौतिक जीवन का आनंद लेना चाहते हैं। उनका सिद्धांत है: "जब तक आप जीवित रहें, तब तक आपको समृद्ध रूप से जीना चाहिए। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप सभी प्रकार के तथाकथित पाप करते हैं। आपको खूब खाना चाहिए। भीख मांगो, उधार लो और चोरी करो, और अगर आपको लगता है कि चोरी करने और उधार लेने से आप पापपूर्ण गतिविधियों में उलझ रहे हैं जिसके लिए आपको भुगतान करना होगा, तो बस उस गलतफहमी को भूल जाइए क्योंकि मृत्यु के बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है। अपने जीवन के दौरान वह जो कुछ भी करता है उसके लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं होता है।" जीवन की यह नास्तिक अवधारणा मानवीय सभ्यता को मार रही है, क्योंकि यह शाश्वत जीवन की निरंतरता के ज्ञान के बिना है।

यह अंध-तामिस्र अज्ञान तमस के कारण है। आत्मा के बारे में कुछ भी नहीं जानने की स्थिति को तमस कहते हैं। इस भौतिक जगत को भी सामान्यतः तमस कहा जाता है क्योंकि इसके निन्यानबे प्रतिशत जीव आत्मा के रूप में अपनी पहचान से अनभिज्ञ हैं। लगभग हर कोई सोच रहा है कि वह यह शरीर है; उसे आत्मा के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इस भ्रांति से निर्देशित होकर, व्यक्ति हमेशा सोचता है, "यह मेरा शरीर है, और इस शरीर के साथ संबंध में कुछ भी मेरा है।" ऐसी गुमराह जीवों के लिए, कामुक जीवन भौतिक अस्तित्व की पृष्ठभूमि है। दरअसल, इस भौतिक संसार में अज्ञान में बंधी आत्माएं केवल कामुक जीवन द्वारा निर्देशित होती हैं, और जैसे ही उन्हें कामुक जीवन का अवसर मिलता है, वे तथाकथित घर, मातृभूमि, बच्चे, धन और ऐश्वर्य से जुड़ जाते हैं। जैसे-जैसे ये आसक्तियाँ बढ़ती जाती हैं, मोह या शारीरिक अवधारणा के भ्रम का जीवन भी बढ़ता जाता है। इस प्रकार यह विचार कि "मैं यह शरीर हूँ, और इस शरीर से संबंधित सब कुछ मेरा है" भी बढ़ता जाता है, और जैसे ही पूरी दुनिया को मोह में डाला जाता है, सांप्रदायिक समाज, परिवार और राष्ट्रीयताएँ निर्मित होती हैं, और वे एक दूसरे के साथ लड़ते हैं। महा-मोह का अर्थ है भौतिक सुख के पीछे पागल होना। विशेष रूप से कलियुग में, हर कोई भौतिक सुख के लिए सामान जमा करने की दीवानगी से अभिभूत है। विष्णु पुराण में इन परिभाषाओं को बहुत अच्छी तरह से दिया गया है, जिसमें कहा गया है:

तमो विवेको मोहः स्यात्

अंतःकरण-विभ्रमः

महा-मोहस्तु विज्ञेयो

ग्राम्य-भोग-सुखैषणा

मरनम् ह्यंध-तामिस्रम्

तामिस्रम् क्रोध उच्यते

अविद्या पंच-पर्वेषा

प्रादुर्भूता महत्मनः

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)