श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.2.9 
इङ्गितज्ञा: पुरुप्रौढा एकारामाश्च सात्वता: ।
सात्वतामृषभं सर्वे भूतावासममंसत ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
यदुगण अनुभवी भक्त तथा ज्ञानी थे और मनोविज्ञान का अध्ययन करने में निपुण थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वो लोग सभी तरह के विश्रामों में भगवान् के साथ रहते थे, फिर भी वे उन्हें बस सर्वत्र निवास करने वाले एक ब्रह्म के रूप में ही जान पाये।
 
The Yadus were experienced devotees, learned men and adept in psychological studies. What was even more remarkable was that they all lived with the Lord in all kinds of relaxation, yet they could know Him only as the Brahman who dwells everywhere.
तात्पर्य
वैदिक वांग्मय में श्लोक आया है कि परमात्मा को केवल ज्ञान की शक्ति या मानसिक अटकल से नहीं जाना जा सकता: नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया, न बहुना श्रुतेन (कठ उपनिषद् 1.2.23)। उन्हें केवल वे ही जान सकते हैं जिस पर प्रभु की दया हो। यादव सभी अपवाद रूप से विद्वान और अनुभवी थे, परन्तु उनके प्रत्येक प्राणी के हृदय में रहनेवाले प्रभु को जानने के बाद भी वे यह नहीं समझ पाए कि वह भगवान की मूल सत्ता हैं। ज्ञान की इस कमी का कारण उनकी ज्ञान की कमी नहीं था; यह उनके दुर्भाग्य के कारण था। परन्तु वृन्दावन में, प्रभु को परमात्मा के रूप में भी नहीं जाना जाता था क्योंकि वार्हणावन के वासी प्रभु के पवित्र अपरम्परागत भक्त थे और वह उन्हें केवल प्रेम के विषय के तौर पर देखते थे। वे यह नहीं जानते थे कि वह भगवान की सबसे बड़ी सत्ता है। यदु या द्वारका के वासी प्रभु कृष्ण को वासुदेव या हर जगह रहने वाला आत्मा के रूप में जान सकते थे, परन्तु सर्वोच्च प्रभु के रूप में नहीं। वेदों के विद्वानों के रूप में, उन्होंने वैदिक श्लोक सत्यापित किया: एको देवः ... सर्व भूत आधिवासः ... , अंतर्यमी... और वृष्णनां पर देवता...। इसलिए, यादव प्रभु कृष्ण को अपनी फैमिली में अवतरित परमात्मा के रूप में स्वीकारते थे, और वह भी उससे ज़्यादा नहीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)