श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.2.7 
उद्धव उवाच
कृष्णद्युमणिनिम्‍लोचे गीर्णेष्वजगरेण ह ।
किं नु न: कुशलं ब्रूयां गतश्रीषु गृहेष्वहम् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
श्री उद्धव ने कहा: हे विदुर, दुनिया के सूरज, भगवान कृष्ण अस्त हो चुके हैं और अब हमारे घर को समय के विशाल सांप ने निगल लिया है। अपनी खुशहाली के बारे में मैं आपसे क्या कह सकता हूँ?
 
Sri Uddhava said: O Vidura, the Sun of the world, Krishna, has set and now our house has been swallowed by the huge python of death. What can I tell you about my well-being?
तात्पर्य
कृष्ण सूर्य के अस्त होने की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है, जैसा कि श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की टीका के अनुसार है। विदुर को महान दुःख हुआ जब उन्हें यादव वंश के साथ-साथ अपने परिवार कुरु वंश के विनाश का संकेत मिला। उद्धव विदुर के दुख को समझ सकते थे, और इसलिए उन्होंने सबसे पहले उनके साथ सहानुभूति व्यक्त करते हुए कहा कि सूर्यास्त के बाद हर कोई अंधेरे में होता है। चूंकि पूरी दुनिया दुख के अंधेरे में डूबी हुई थी, इसलिए विदुर, उद्धव या कोई और खुश नहीं हो सकता था। उद्धव विदुर की तरह ही दुखी थे, और उनके कल्याण के बारे में कहने के लिए और कुछ नहीं था।

कृष्ण की सूर्य से तुलना बहुत उपयुक्त है। जैसे ही सूर्य अस्त होता है, अंधेरा अपने आप प्रकट हो जाता है। लेकिन आम आदमी द्वारा अनुभव किया गया अंधेरा सूर्य को सूर्योदय या सूर्यास्त के समय प्रभावित नहीं करता है। भगवान कृष्ण का प्रकट और अदृश्य होना बिल्कुल सूर्य की तरह है। वे असंख्य ब्रह्मांडों में प्रकट होते हैं और विलुप्त हो जाते हैं, और जब तक वे किसी विशेष ब्रह्मांड में मौजूद रहते हैं तब तक उस ब्रह्मांड में सब कुछ प्रकाशमान रहता है, लेकिन जिस ब्रह्मांड से वे विलुप्त हो जाते हैं वह अंधकार में चला जाता है। हालाँकि, उनके लीला अनादि और अनंत हैं। भगवान हमेशा किसी न किसी ब्रह्मांड में मौजूद रहते हैं, जैसे सूर्य पूर्वी या पश्चिमी गोलार्ध में मौजूद रहता है। सूर्य हमेशा भारत या अमेरिका में मौजूद रहता है, लेकिन जब सूर्य भारत में होता है, अमेरिकी भूमि अंधेरे में होती है, और जब सूर्य अमेरिका में होता है, भारतीय गोलार्ध अंधेरे में होता है।

जैसे सूर्य सुबह प्रकट होता है और धीरे-धीरे मध्याह्न तक जाता है और फिर एक गोलार्ध में स्थापित होता है जबकि एक साथ दूसरे में उदय होता है, वैसे ही एक ब्रह्मांड में भगवान कृष्ण का विलुप्त होना और दूसरे में उनके भिन्न-भिन्न लीला का प्रारंभ एक साथ होता है। जैसे ही एक लीला यहाँ समाप्त होती है, यह दूसरे ब्रह्मांड में प्रकट होती है। और इस तरह उनकी नित्य-लीला या शाश्वत लीला बिना समाप्त हुए चलती रहती है। जैसे 24 घंटे में केवल एक सूर्योदय होता है, वैसे ही भगवान कृष्ण की लीलाएँ ब्रह्मा के एक दिन में एक बार होती हैं, जिसका लेखा-जोखा भगवद्-गीता में 4,300,000,000 सौर वर्षों के रूप में दिया गया है। लेकिन जहाँ भी भगवान विद्यमान हैं, उनके सभी विभिन्न लीला जैसा कि प्रकट ग्रंथों में वर्णित हैं, नियमित अंतराल पर होती हैं।

जैसे सूर्यास्त के समय साँप शक्तिशाली हो जाते हैं, चोरों को प्रोत्साहन मिलता है, भूत सक्रिय हो जाते हैं, कमल विकृत हो जाता है और चक्रवाक विलाप करता है, वैसे ही भगवान कृष्ण के विलुप्त होने पर नास्तिक जीवंत महसूस करते हैं, और भक्त दुखी होते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)