इस सबसे ऊपर, भगवान अपनी प्रसिद्ध बाँसुरी बजाते थे। उनकी बाँसुरी से निकलने वाली आवाज़ उनके दोस्तों को ऐसा अलौकिक सुख देती थी कि वे ब्रह्मानंद की सभी बातों को भूल जाते थे, जिसकी निराकारवादियों द्वारा बहुत प्रशंसा की जाती है। ये ग्वाले, जैसा कि शुकदेव गोस्वामी द्वारा समझाया जाएगा, वे जीवित प्राणी थे जिन्होंने पुण्य कार्यों के ढेर जमा किए थे और इस प्रकार स्वयं भगवान के साथ आनंद ले रहे थे और उनकी दिव्य बाँसुरी सुन रहे थे। ब्रह्म-संहिता (5.30) में भगवान की दिव्य बाँसुरी बजाने की पुष्टि की गई है।
वेणुं क्वणन्तम अरविंद-दलायताक्षं
बरहावतंशम असितांबुद-सुंदरंगम
कंदर्प-कोटि-कमनीय-विशेष-शोभं
गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामि
ब्रह्माजी ने कहा, "मैं गोविंद की पूजा करता हूं, जो आदिम प्रभु हैं, जो अपनी दिव्य बाँसुरी बजाते हैं। उनकी आँखें कमल के फूलों की तरह हैं। वे मोर पंखों से सजाए हुए हैं और उनके शरीर का रंग एक ताजा काले बादल जैसा है, हालाँकि उनकी शारीरिक विशेषताएँ लाखों कामदेव से अधिक सुंदर हैं।" ये भगवान की विशेष विशेषताएँ हैं।
