श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.2.28 
कौमारीं दर्शयंश्चेष्टां प्रेक्षणीयां व्रजौकसाम् ।
रुदन्निव हसन्मुग्धबालसिंहावलोकन: ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
जब प्रभु ने बाल्यावस्था के अनुरूप कार्य किए, तब उन्हें केवल वृन्दावन के निवासी ही देख सकते थे। वे शिशु की तरह कभी रोते थे तो कभी हँसते थे और ऐसा करते हुए वे शेर के शावक की तरह प्रतीत होते थे।
 
When the Lord performed childlike activities, He was visible only to the residents of Vrindavan. He would sometimes cry and sometimes laugh like a child, and while doing so, He appeared like a lion cub.
तात्पर्य
यदि कोई भी प्रभु के बचपन के काल की लीलाओं का आनंद लेना चाहता हो तो उसे नन्द, उपनन्द और अन्य माता-पिता रूपी वृजवासियों के चरणों में अवश्य चलना होगा। कोई बच्चा किसी चीज़ के लिए ज़िद कर सकता है और उसे पाने के लिए खूब रो सकता है, जिससे पूरा मोहल्ला ही परेशान हो जाता हो और उसके बाद वांछित चीज मिलने के तुरंत बाद वह बच्चा हँस देता है। ऐसा रोना और हँसना माता-पिता और परिवार के बड़े-बुज़ुर्गों के लिए आनंदमय होता है, इसलिए प्रभु भी उसी तरह रोते और हँसते और अपने भक्त माता-पिता को अलौकिक आनंद की विनोदता में विलीन कर देते। यह कृत्य वृजवासी जैसे कि नन्द महाराज ही आनंद ले सकते हैं, न कि ब्रह्मण या परमात्मा के निराकार उपासक। कभी-कभी जंगल में राक्षसों द्वारा आक्रमण किए जाने पर, कृष्ण आश्चर्य से त्रस्त दिखते, लेकिन वह उन राक्षसों को शेर के शावक की तरह देखते और उनका वध कर देते। उनके बचपन के साथी भी आश्चर्य से चकित रह जाते, और जब वे घर लौट आते तो अपने माता-पिता को पूरी कहानी सुनाते, और हर कोई उनके कृष्ण के गुणों की प्रशंसा करते। बालक कृष्ण केवल अपने माता-पिता, नंद और यशोदा के ही नहीं थे; वह वृंदावन के सभी बुजुर्ग निवासियों के पुत्र और सभी समवयस्क लड़कों और लड़कियों के मित्र थे। हर कोई कृष्ण से प्यार करता था। वह जानवरों, गायों और बछड़ों सहित हर किसी का जीवन और आत्मा थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)