यमुना के किनारे वाले जंगल सभी खूबसूरत बगीचे हैं जो आम, कटहल, सेब, अमरूद, संतरा, अंगूर, बेरी, ताड़ के पेड़ और ऐसे ही दूसरे कई पेड़ और खुशबूदार फूलों से भरे हैं। और चूंकि वह जंगल यमुना के तट पर था तो वहाँ पेड़ों की डालों पर बतख, सारस और मोर स्वाभाविक रूप से पाए जाते थे। ये सभी पेड़, पक्षी और पशु पवित्र जीव थे जो व्रंदावन के अलौकिक निवास में केवल भगवान और उनके शाश्वत साथियों, ग्वाला लड़कों को प्रसन्नता देने के लिए जन्मे थे।
अपने साथियों के साथ एक छोटे बच्चे की तरह खेलते हुए, ईश्वर ने कई राक्षसों को मारा, जिसमें अघासुर, बकासुर, प्रलंबासुर और गदर्भी असुर शामिल है। हालाँकि वह व्रजभूमि में एक लड़के के रूप में ही प्रकट हुए थे, परंतु वास्तव में वह आग की ढंकी हुई लपटों की तरह थे। जैसे आग का एक छोटा सा कण ईंधन के साथ एक बड़ी आग को प्रज्वलित कर सकता है, वैसे ही नंद महाराज के घर में अपने शैशव काल से ही, भगवान ने इन सभी राक्षसों को मार डाला था। भगवान का बचपन का खेल का मैदान व्रजभूमि, आज भी वही है और जो भी इन स्थानों पर जाता है वही परमानंद का आनंद लेता है, हालाँकि भगवान हमारी अपूर्ण आँखों को भौतिक रूप से दिखाई नहीं देते। भगवान चैतन्य ने भगवान की इस भूमि की सलाह भगवान के ही समान दी और इसीलिए भक्तों द्वारा पूजनीय है। यह निर्देश खास तौर पर भगवान चैतन्य के अनुयायियों द्वारा लिया गया है जिन्हें गौड़ वैष्णव के नाम से जाना जाता है। और चूंकि यह भूमि भगवान के समान है इसलिए उद्धव और विदुर जैसे भक्तों ने भगवान से सीधा संपर्क स्थापित करने के लिए पाँच हजार साल पहले इन स्थानों का दौरा किया था, चाहे वो दिखाई दें या न दिखाई दें। भगवान के हजारों भक्त अभी भी व्रजभूमि के इन पवित्र स्थानों में विचरण कर रहे हैं और उन सभी ने वापस घर, वापस भगवान के पास जाने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं।
