श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 2: भगवान् कृष्ण का स्मरण  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.2.26 
ततो नन्दव्रजमित: पित्रा कंसाद्विबिभ्यता ।
एकादश समास्तत्र गूढार्चि: सबलोऽवसत् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, कंस से डरते हुए, उनके पिता उन्हें महाराज नंद के चरागाह में ले आए जहाँ वे अपने बड़े भाई बलदेव सहित एक ज्वलंत लौ की तरह ग्यारह वर्षों तक रहे।
 
Thereafter, fearful of Kamsa, His father brought Him to the pastures of Nanda Maharaja, where He lived along with His elder brother Baladeva like a covered fire for eleven years.
तात्पर्य
भगवान को नंद महाराज के घर इसलिए भेजा गया था कि कंस उन्हें मारने का निश्चय कर लेंगे। असुरों का धंधा इसी तरह का है, वे भगवान को मारने का प्रयास करते हैं या फिर साबित करने का प्रयास करते हैं कि कोई भगवान नहीं है या फिर कृष्ण सामान्य मानव है न कि भगवान। कृष्ण, कंस-जैसे लोगों के ऐसे निश्चय से प्रभावित नहीं होते हैं पर एक बच्चे की भूमिका निभाने के लिए वह अपने पिता द्वारा नंद महाराज के गायों के चरागाह में छिपाए जाने के लिए तैयार हो गए क्योंकि वसुदेव कंस से भयभीत थे। नंद महाराज उनके अपने बच्चे के रूप में उनकी आगवानी करने वाले थे और यशोदामायी भी भगवान के बचपन की लीलाओं का आनंद उठाने वाली थी। इसलिए सभी की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें कंस की जेल में अवतरित होने के तुरंत बाद मथुरा से वृंदावन ले जाया गया। वह ग्यारह वर्षों तक वहां रहे और उन्होंने अपनी किशोरावस्था, लड़कपन और युवावस्था से जुड़ी सभी आकर्षक लीलाएं अपने बड़े भाई, भगवान बलदेव के साथ पूरी कीं, जो उनका पहला विस्तार थे। वसुदेव का कृष्ण को कंस के क्रोध से बचाने का विचार दिव्य संबंधों का अंग है। कोई उन्हें अपने अधीनस्थ पुत्र के रूप में लेता है, उनकी सुरक्षा करता है तो भगवान उसे ज्यादा पसंद करते हैं और जब कोई उन्हें सर्वोच्च ईश्वर मानता है। वह सभी के पिता हैं और वह सभी की रक्षा करते हैं पर जब उनके भक्त यह मान लेते हैं कि भगवान को भक्तों की देखभाल द्वारा संरक्षित होना चाहिए तो यह भगवान के लिए एक दिव्य आनंद बन जाता है। इसलिए जब कंस के भय से वसुदेव उन्हें वृंदावन ले गए तो भगवान ने इसका आनंद लिया, नहीं तो उन्हें कंस या किसी और से कोई डर नहीं था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)