वसुदेवस्य देवक्यां जातो भोजेन्द्रबन्धने ।
चिकीर्षुर्भगवानस्या: शमजेनाभियाचित: ॥ २५ ॥
अनुवाद
पृथ्वी पर कल्याणकारी कार्यों हेतु ब्रह्माजी की प्रार्थना पर भोजराज के कारागृह में वसुदेव ने उनकी पत्नी देवकी की कोख से भगवान श्री कृष्ण को जन्म दिया।
Lord Shri Krishna was created by Vasudeva from the womb of his wife Devaki in the prison of King Bhoj, upon Brahma's request to bring welfare on earth.
तात्पर्य
हालाँकि प्रभु के आविर्भाव और तिरोभाव के लीलाओं में कोई अंतर नहीं होता, भगवान के भक्त सामान्य रूप से उनके तिरोभाव के विषय पर चर्चा नहीं करते। विदुर ने प्रभु के तिरोभाव की घटना के बारे में उद्धव से अप्रत्यक्ष रूप से पूछा कि वह उन्हें कृष्ण-कथा, या भगवान कृष्ण के इतिहास से संबंधित विषय को सुनाएँ। इस प्रकार उद्धव ने कथा की शुरुआत से ही अपने आविर्भाव के बारे में शुरू किया जैसे कि वह भोजों के राजा, मथुरा के कंस की जेल में वसुदेव और देवकी के पुत्र रूप में पैदा हुए। इस संसार में प्रभु का कोई कार्य नहीं है, लेकिन जब ब्रह्मा जैसे भक्त उनसे निवेदन करते हैं, तो वह पूरे ब्रह्मांड के कल्याण के लिए पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। इसे भगवद-गीता (4.8) में कहा गया है: "परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम् / धर्म-संस्थापनार्थாய संभवामि युगे युगे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥