परम कृपाशील प्रभु कृष्ण की दया महाभारत युद्ध के समय महाराज युधिष्ठिर की सभा में स्पष्ट रूप से देखी गई थी। वह अपने शत्रु चेदिराज पर भी दयालु थे, जो हमेशा ईर्ष्या के कारण प्रभु के विरोधी रहते थे। चूँकि प्रभु का सच्चा शत्रु होना असंभव है, इसलिए चेदिराज प्रभु कृष्ण से अत्यधिक द्वेष करते थे। इस प्रकार से वह कंस व जरासंध जैसे असुरों के समान थे। महाराज युधिष्ठिर द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ की खुली सभा में शिशुपाल ने प्रभु कृष्ण का अपमान किया था और अंततः प्रभु के हाथों मारे गए थे। किन्तु सभा में मौजूद सभी लोगों ने देखा कि चेदिराज के शरीर से एक ज्योति निकली और वह प्रभु कृष्ण के शरीर में विलीन हो गई। इसका अर्थ है कि चेदिराज ने परमपिता परमात्मा के साथ एकता प्राप्त करने का उद्धार प्राप्त कर लिया था जो कि ज्ञानियों और योगियों की सर्वोच्च अभिलाषा है और जिसके लिए वह विभिन्न प्रकार की पारलौकिक साधनाएं करते हैं।
यह सत्य है कि जो व्यक्ति मानसिक तर्क अथवा योग की गुह्य शक्तियों के द्वारा अपने व्यक्तिगत प्रयासों से परम सत्य को समझने का प्रयास करते हैं वह वही लक्ष्य प्राप्त करते हैं जिन्हें प्रभु अपने हाथों से मारते हैं। दोनों ही व्यक्ति प्रभु के दिव्य शरीर के ब्रह्मज्योति किरणों में विलीन होने का उद्धार प्राप्त करते हैं। प्रभु अपने शत्रु पर भी कृपालु थे और चेदिराज की सफलता को सभा में उपस्थित सभी लोगों ने देखा था। विदुर भी वहाँ उपस्थित थे, इसलिए उद्धव ने यह घटना उनकी स्मृति को याद दिलाने के लिए कही।
