ये सभी भगवान के गौरवशाली लीला हैं, और ऐसी अभिव्यक्तियों में कोई विरोधाभास नहीं है। क्योंकि कृष्ण सर्वोच्च भगवान हैं, इसलिए वे कभी भी कंस से नहीं डरे, परंतु अपने पिता को खुश करने के लिए वे ऐसा होने के लिए सहमत हो गए। और उनके सर्वोच्च चरित्र का सबसे शानदार हिस्सा वह था जब उन्होंने कंस के डर के कारण घर से अनुपस्थित रहने पर अपने माता-पिता के चरणों की सेवा न कर पाने के लिए उनसे क्षमा मांगी। जिनके चरण कमलों की पूजा ब्रह्मा और शिव जैसे देवता करते हैं, वह भगवान वसुदेव के चरणों की पूजा करना चाहते थे। भगवान का दुनिया को ऐसा निर्देश देना बिल्कुल उचित है। भले ही कोई सर्वोच्च भगवान हो, उसे अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। एक पुत्र अपने माता-पिता का अनेक तरीकों से ऋणी होता है, और पुत्र का यह कर्तव्य है कि वह अपने माता-पिता की सेवा करे, चाहे पुत्र कितना भी महान क्यों न हो। परोक्ष रूप से, कृष्ण उन नास्तिकों को सबक देना चाहते थे जो ईश्वर को सर्वोच्च पिता नहीं मानते, और वे इस कार्य से सीख सकते हैं कि सर्वोच्च पिता का कितना सम्मान करना है। उद्धव भगवान के ऐसे गौरवशाली व्यवहार से बस चकित रह गए, और उन्हें बहुत दुख था कि वे उनके साथ नहीं जा पाए।
