जब प्रभु की लीलाएँ मानवीय दृष्टि को दिखाई पड़ती हैं, तो उन्हें प्रकट कहा जाता है, और जब वे दिखाई नहीं पड़ती हैं, तो उन्हें अप्रकट कहा जाता है। वास्तव में, प्रभु की लीलाएँ कभी नहीं रुकतीं, जैसे सूर्य कभी आकाश नहीं छोड़ता। सूर्य हमेशा आकाश में अपनी सही कक्षा में रहता है, लेकिन कभी-कभी वह हमारी सीमित दृष्टि के लिए दृश्यमान होता है और कभी-कभी अदृश्य होता है। इसी तरह, प्रभु की लीलाएँ हमेशा एक या दूसरे ब्रह्मांड में वर्तमान रहती हैं, और जब भगवान कृष्ण द्वारका के दिव्य निवास से विलुप्त हुए, तो यह वहाँ के लोगों की नज़रों से विलुप्ति मात्र थी। यह गलत नहीं समझा जाना चाहिए कि उनका दिव्य शरीर, जो नश्वर जगत में लीलाओं के लिए सर्वथा उपयुक्त है, किसी भी तरह से वैकुंठलोक में उनके विभिन्न विस्तारों से कमतर है। भौतिक जगत में प्रकट उनका शरीर श्रेष्ठतम पारमार्थिक इस अर्थ में है कि नश्वर जगत में उनकी लीलाएँ वैकुंठलोक में प्रदर्शित उनकी दया से श्रेष्ठ हैं। वैकुंठलोक में प्रभु मुक्त या नित्य-मुक्त जीवों के प्रति दयालु होते हैं, लेकिन नश्वर जगत में अपनी लीलाओं में वे उन अधम आत्माओं के प्रति भी दयालु होते हैं जो नित्य-बद्ध हैं, या हमेशा के लिए बद्ध हैं। छह श्रेष्ठ ऐश्वर्य जो उन्होंने नश्वर जगत में अपनी आंतरिक शक्ति योगमाया की एजेंसी द्वारा प्रदर्शित किए, वे वैकुंठलोक में भी दुर्लभ हैं। उनके सभी लीलाएँ भौतिक ऊर्जा से नहीं बल्कि उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रकट हुए थे। वृंदावन में उनकी रास-लीला और सोलह हजार पत्नियाँ सहित उनकी गृहस्थ लीला की श्रेष्ठता वैकुंठ में नारायण के लिए भी अद्भुत है और निश्चित रूप से इस नश्वर जगत के अन्य जीवों के लिए तो है ही। उनके लीलाएँ प्रभु के अन्य अवतारों, जैसे श्री राम, नृसिंह और वराह के लिए भी अद्भुत हैं। उनका वैभव इतना असाधारण था कि उनकी लीलाओं को स्वयं भगवान कृष्ण से भिन्न न होने वाले वैकुंठ के स्वामी ने भी पूजा जाता था।
