यादव प्रभु के बारे में केवल आंशिक रूप से संज्ञान रखते थे, लेकिन वे भी गौरवशाली हैं क्योंकि उन्हें प्रभु से जुड़ने का अवसर मिला था, जो उनके परिवार के मुखिया के रूप में कार्य करते थे, और उन्होंने प्रभु को अंतरंग सेवा भी प्रदान की थी। यादव और प्रभु के अन्य भक्त उन लोगों से अलग हैं जिन्होंने गलत तरीके से उनको एक साधारण मानवीय व्यक्तित्व माना। ऐसे लोग निश्चित रूप से भ्रामक ऊर्जा से भ्रमित हैं। वे नारकीय हैं और सर्वोच्च प्रभु से ईर्ष्यालु हैं। भ्रामक ऊर्जा उन पर बहुत शक्तिशाली रूप से कार्य करती है क्योंकि अपनी उन्नत सांसारिक शिक्षा के बावजूद, ऐसे लोग विश्वासहीन होते हैं और नास्तिकता की मानसिकता से संक्रमित होते हैं। वे हमेशा यह स्थापित करने के लिए बहुत उत्सुक होते हैं कि भगवान कृष्ण एक साधारण व्यक्ति थे जिन्हें धृतराष्ट्र और जरासंध, धरती के राक्षसी राजाओं के पुत्रों को मारने की साजिश में अपने कई अधर्मी कृत्यों के कारण एक शिकारी द्वारा मार दिया गया था। ऐसे लोगों को भगवद्-गीता के इस कथन पर कोई विश्वास नहीं है कि प्रभु कर्मों की प्रतिक्रियाओं से अप्रभावित हैं: न माम कर्माणि लिम्पन्ति। नास्तिक दृष्टिकोण के अनुसार, भगवान कृष्ण के परिवार, यादव वंश को धृतराष्ट्र के पुत्रों आदि की हत्या में कृष्ण द्वारा किए गए पापों के लिए ब्राह्मणों द्वारा शापित किए जाने के कारण नष्ट कर दिया गया था। ये सभी निंदाएँ भगवान के भक्तों के हृदय को स्पर्श नहीं करती क्योंकि वे भली-भांति जानते हैं कि क्या है क्या। प्रभु के बारे में उनकी बुद्धि कभी अशांत नहीं होती। लेकिन जो लोग असुरों के कथनों से परेशान हैं, उनकी भी निंदा की जाती है। यही इस श्लोक में उद्धव का तात्पर्य था।
