श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 19: असुर हिरण्याक्ष का वध  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.19.33 
सूत उवाच
इति कौषारवाख्यातामाश्रुत्य भगवत्कथाम् ।
क्षत्तानन्दं परं लेभे महाभागवतो द्विज ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
श्री सूत गोस्वामी ने आगे कहा, हे शौनक, मेरे प्रिय ब्राह्मण, क्षत्ता (विदुर), जो भगवान् के परम भक्त थे, कौषारव (मैत्रेय) मुनि से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की लीलाओं का वर्णन सुनकर दिव्य आनन्द प्राप्त हुए और अति प्रसन्न हुए।
 
Śrī Suta Gosvāmī further said—O Śaunaka, my dear brāhmaṇa, the great devotee of the Lord, Kṣṭā (Vidura), having heard the narration of the pastimes of the Supreme Personality of Godhead from the authoritative source of the sage Kausharava (Maitreya), received transcendental bliss and became very pleased.
तात्पर्य
जो भी प्रभु के चरित्रों को सुनकर पराभौतिक सुख प्राप्त करना चाहता है, उसे अधिकृत श्रोत से ही सुनना चाहिए, जैसा कि यहाँ बताया गया है। मैत्रेय ने विवरण अपने प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से सुना। विदुर ने भी मैत्रेय से ही सुना। व्यक्ति अपने आध्यात्मिक गुरु से जो भी सुनता है, उसको प्रस्तुत करके ही अधिकारी बनता है। जो प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार नहीं करता है वह अधिकारी नहीं बन सकता है। यहाँ इस दावे को अच्छे से समझाया गया है। जो भी व्यक्ति पराभौतिकता में सुख चाहता है उसे एक अधिकृत व्यक्ति को खोजना चाहिए। भागवतम में यह भी बताया गया है कि केवल अधिकृत श्रोत के माध्यम से ही कान और हृदय द्वारा प्रभु के चरित्रों का आनंद लिया जा सकता है। इसके बिना यह संभव नहीं है। इसलिए सनातन गोस्वामी ने सावधान किया है कि लोग उनके बारे में कुछ भी होंठों से नहीं सुनें जो भगवान के लिए समर्पित नहीं है। जो भगवान के लिए समर्पित नहीं है उन्हें सर्प माना जाता है। जिस तरह दूध सर्प के छूने से विषैला हो जाता है, उसी तरह यद्यपि प्रभु के चरित्रों की कहानी दूध की तरह पवित्र होती है, लेकिन जो लोग भगवान के लिए समर्पित नहीं है वे सर्प के समान हैं, उनके बीच में कहानी विषैली हो जाती है। इससे न केवल पराभौतिकता का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, बल्कि यह खतरनाक भी है। भगवान चैतन्य महाप्रभु ने चेतावनी दी है कि मायावादी या अवैयक्तिक लोगों से प्रभु के चरित्रों के विवरण नहीं सुनने चाहिए। उन्होंने खास तौर पर कहा है, मायावादी-भाष्य सुनिले हया सर्व नास: अगर कोई प्रभु के चरित्रों या भगवद-गीता, श्रीमद-भागवतम या किसी वैदिक साहित्य की मायावादियों की व्याख्या को सुनता है, तो उसे मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। अगर कोई व्यक्ति व्यक्तिवादियों के साथ जुड़ जाए, तो वह भगवान के व्यक्तिगत गुणों और उनके पराभौतिक चरित्रों को कभी भी समझ नहीं पाएगा। सूत गोस्वामी उन ऋषियों से बात कर रहे थे जिनकी अगुवाई शौनक कर रहे थे। इसलिए इस श्लोक में उन्होंने उनको द्विज यानी दोबारा जन्में हुए कहकर संबोधित किया। नैमिषारण्य में इकट्ठा हुए ऋषि सूत गोस्वामी से श्रीमद-भागवतम सुन रहे थे। वे सभी ब्राह्माण थे, लेकिन ब्राह्माण होने की योग्यता को हासिल करना सब कुछ नहीं है। केवल दोबारा जन्म लेना ही पूर्णता नहीं है। पूर्णता तब हासिल होती है जब कोई प्रामाणिक श्रोत के माध्यम से प्रभु के चरित्र और कार्यकलापों को सुनता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)