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श्लोक 3.19.16  |
तेनेत्थमाहत: क्षत्तर्भगवानादिसूकर: ।
नाकम्पत मनाक् क्वापि स्रजा हत इव द्विप: ॥ १६ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे विदुर, असुर द्वारा इस प्रकार चोट लगने पर भी प्राकट्य रूप में आए वराह भगवान के शरीर का कोई अंग तनिक भी नहीं हिला जैसे मानो किसी हाथी पर फूलों की माला से प्रहार किया गया हो। |
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| हे विदुर, असुर द्वारा इस प्रकार चोट लगने पर भी प्राकट्य रूप में आए वराह भगवान के शरीर का कोई अंग तनिक भी नहीं हिला जैसे मानो किसी हाथी पर फूलों की माला से प्रहार किया गया हो। |
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