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श्लोक 3.19.13  |
जग्राह त्रिशिखं शूलं ज्वलज्ज्वलनलोलुपम् ।
यज्ञाय धृतरूपाय विप्रायाभिचरन् यथा ॥ १३ ॥ |
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| अनुवाद |
| अब उसने प्रचंड अग्नि की तरह धधकते हुए त्रिशूल को निकाल फेंका और समस्त यज्ञों के उपभोक्ता भगवान् पर उछाला, जैसे कोई पवित्र ब्राह्मण पर दुर्भावना से अपनी तपस्या का उपयोग करता है। |
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| अब उसने प्रचंड अग्नि की तरह धधकते हुए त्रिशूल को निकाल फेंका और समस्त यज्ञों के उपभोक्ता भगवान् पर उछाला, जैसे कोई पवित्र ब्राह्मण पर दुर्भावना से अपनी तपस्या का उपयोग करता है। |
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