दैत्य न केवल हमेशा ईश्वर को शब्दों और दर्शन से मारने के लिए उत्सुक रहते हैं, बल्कि वे सोचते हैं कि यदि कोई भौतिक रूप से शक्तिशाली है तो वह ईश्वर को भौतिक रूप से घातक हथियारों से मार सकता है। कंस, रावण और हिरण्यकश्यपु जैसे राक्षस खुद को ईश्वर को भी मारने में पर्याप्त शक्तिशाली समझते थे। राक्षस यह नहीं समझ सकते कि ईश्वर अपनी बहुविध शक्तियों के द्वारा इतने आश्चर्यजनक ढंग से कार्य कर सकते हैं कि वे हर जगह उपस्थित हो सकते हैं और फिर भी अपने शाश्वत निवास, गोलोक वृंदावन में बने रह सकते हैं।
