श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  3.18.22-23 
ब्रह्मोवाच
एष ते देव देवानामङ्‌घ्रिमूलमुपेयुषाम् ।
विप्राणां सौरभेयीणां भूतानामप्यनागसाम् ॥ २२ ॥
आगस्कृद्भयकृद्दुष्कृदस्मद्राद्धवरोऽसुर: ।
अन्वेषन्नप्रतिरथो लोकानटति कण्टक: ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी बोले- हे प्रभु, यह राक्षस देवताओं, ब्राह्मणों, गायों और उन निष्पाप लोगों के लिए लगातार एक काँटे की तरह बन गया है, जो हमेशा आपके चरण-कमलों की पूजा में लीन रहते हैं। वह उन्हें बिना किसी कारण सताता रहता है और उनके लिए भय का कारण बन गया है। उसने मुझसे वरदान प्राप्त किया है, जिसके कारण वह एक राक्षस बन गया है और पूरे संसार में अपने समान शक्तिशाली योद्धा की तलाश में घूमता रहता है ताकि इस दुष्ट कार्य को पूरा कर सके।
 
Brahmaji said, "O Lord, this demon has become a thorn that is constantly pricking the gods, Brahmins, cows and the innocent people who have surrendered to your lotus feet. By harassing them without any reason, he has become the cause of fear. By harassing them without any reason, he has become a demon and roams all over the world in search of a warrior of his own for this evil work."
तात्पर्य
जीवों के दो वर्ग हैं: एक को सुर या देवता कहा जाता है, और दूसरे को असुर या राक्षस कहा जाता है। राक्षस सामान्यतः देवताओं की पूजा करने के प्रेमी होते हैं, और ऐसे प्रमाण हैं कि ऐसी पूजा से उन्हें अपनी इन्द्रिय तृप्ति के लिए विस्तृत शक्ति प्राप्त होती है। यह बाद में ब्राह्मणों, देवताओं और अन्य निर्दोष जीवों के लिए परेशानी का कारण बनता है। राक्षस आदतन देवताओं, ब्राह्मणों और निर्दोषों में दोष ढूंढते हैं, जिनके लिए वे निरंतर भय का स्रोत होते हैं। राक्षस का तरीका देवताओं से शक्ति लेना और फिर स्वयं देवताओं को परेशान करना है। भगवान शिव के एक महान भक्त का उदाहरण है जिसने भगवान शिव से एक वर प्राप्त किया कि जिस किसी के सिर को वह अपने हाथ से छूएगा, वह उसके धड़ से निकल जाएगा। जैसे ही उसे वरदान दिया गया, राक्षस भगवान शिव के ही सिर को छूना चाहता था। यही उनका तरीका है। हालाँकि, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के भक्त इंद्रिय तृप्ति के लिए कोई एहसान नहीं मांगते हैं। भले ही उन्हें मुक्ति की पेशकश की जाए, वे इसे अस्वीकार कर देते हैं। वे केवल भगवान की दिव्य प्रेमपूर्ण सेवा में संलग्न होकर खुश हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)