श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 18: भगवान् वराह तथा असुर हिरण्याक्ष के मध्य युद्ध  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.18.2 
ददर्श तत्राभिजितं धराधरं
प्रोन्नीयमानावनिमग्रदंष्ट्रया ।
मुष्णन्तमक्ष्णा स्वरुचोऽरुणश्रिया
जहास चाहो वनगोचरो मृग: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
वहाँ उसने अपनी सुर्ख आँखों से उसके समस्त तेज को हरते हुए, अपनी दाढ़ों के अग्रभाग पर पृथ्वी को ऊपर की ओर धारण किए सर्वशक्तिमान परमेश्वर को उनके वराह रूप में देखा। इस पर वह असुर ठठाकर हँसा और बोला, "अरे! यह कैसा उभयचर पशु है?"
 
There he saw the Almighty Sri Bhagavan in His Varaha form, holding the earth up on the tip of His tusks and taking away all its glory with His blood red eyes. At this the demon laughed and said, “Oh! What kind of an amphibious animal is this?”
तात्पर्य
पिछले अध्याय में हमने वराह के रूप में भगवान के अवतार के विषय में चर्चा की है, जोकि एक जंगली सूअर का रूप था। जब वराह ने अपने नुकीले दाँतों से पृथ्वी को जल से ऊपर उठाया, तब हीरण्याक्ष नाम के महान राक्षस ने उन्हें चुनौती दी और उन्हें जानवर कहकर पुकारा। राक्षस भगवान के अवतारों को नहीं समझ सकते; वे यह सोचते हैं कि मछली, जंगली सूअर या कछुए के रूप में उनका अवतार केवल एक बड़ा सा जानवर मात्र है। वे परमेश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के शरीर को गलत समझते हैं, यहाँ तक कि उनके मानवीय रूप को भी वे नहीं पहचानते और उनके अवतार का उपहास करते हैं। चैतन्य संप्रदाय में कभी-कभी नित्यानंद प्रभु के अवतार के बारे में एक राक्षसी गलतफहमी होती है। नित्यानंद प्रभु का शरीर आध्यात्मिक है, लेकिन राक्षसी व्यक्ति परमेश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के शरीर को भौतिक मानते हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारा शरीर। अवाजानन्ति माम् मूढाः: वे व्यक्ति जिनके पास समझ नहीं होती वे भगवान के अलौकिक रूप का भौतिक रूप के रूप में उपहास करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)