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श्लोक 3.17.7  |
चुक्रोश विमना वार्धिरुदूर्मि: क्षुभितोदर: ।
सोदपानाश्च सरितश्चुक्षुभु: शुष्कपङ्कजा: ॥ ७ ॥ |
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| अनुवाद |
| उन्मादपूर्ण लहरों से परिपूर्ण सागर मानो दुःख से जोर-जोर से चीख रहा था और उसमें वास करने वाले जीवों में अशांति छा गई थी। नदियाँ और झीलें भी आंदोलित हो उठीं और कमल मुरझा गए। |
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| उन्मादपूर्ण लहरों से परिपूर्ण सागर मानो दुःख से जोर-जोर से चीख रहा था और उसमें वास करने वाले जीवों में अशांति छा गई थी। नदियाँ और झीलें भी आंदोलित हो उठीं और कमल मुरझा गए। |
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