|
| |
| |
श्लोक 3.17.5  |
ववौ वायु: सुदु:स्पर्श: फूत्कारानीरयन्मुहु: ।
उन्मूलयन्नगपतीन्वात्यानीको रजोध्वज: ॥ ५ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| फिर बार-बार फुफकारती व विशाल वृक्षों को उखाड़ती हुई अत्यंत दुस्सह स्पर्श वाली हवाएँ चलने लगीं। तभी अंधड़ उनकी सेना के समान और धूल के मेघ उनकी पताकाओं के समान दिखने लगे। |
| |
| फिर बार-बार फुफकारती व विशाल वृक्षों को उखाड़ती हुई अत्यंत दुस्सह स्पर्श वाली हवाएँ चलने लगीं। तभी अंधड़ उनकी सेना के समान और धूल के मेघ उनकी पताकाओं के समान दिखने लगे। |
| ✨ ai-generated |
| |
|